Avinash bharti

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    हुक्मरान इस बात से नाशाद है
    हर किसी की क्यों ज़बाँ आज़ाद है

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    ग़म ने उसकी रोटी तक है छीन ली
    खा नहीं पाता कभी वो पेट भर

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    दिल तुम्हें आज भी बुलाता है
    और फिर थक के बैठ जाता है

    मैं नहीं चाहता की याद आऊँ
    याद जैसा मुझे वो आता है

    कोई वादा किसी से हो ही क्यों
    कौन वादों को अब निभाता है

    बात होती है भूलने की मगर
    कब किसे कोई भूल पाता है

    अपने ख़्वाबों को बेचकर कोई
    चार पैसे कहीं कमाता है

    बात दिल की तू दिल में रहने दे
    क्यूँ तमाशा इसे बनाता है

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    हम टूट गए यूँ तो उम्मीद रही लेकिन
    इस रात अँधेरी को इक भोर से मिलना है

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    किसी की राह तो हैं देखते लेकिन
    किसी का हमसफ़र होने से डरते हैं

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    तुम्हारे नाम का जीवन तुम्हारे बिन न कट जाए
    चलो तुम छोड़ जाना पर कभी यूँ ही मिला करना

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    बात दिल की तू दिल में रहने दे
    क्यूँ तमाशा इसे बनाता है

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    हम टूट गए यूँ तो उम्मीद रही लेकिन
    इस रात अँधेरी को इक भोर से मिलना है

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    रूह तक में उतार कर तुमको
    कौन जीता है मार कर तुमको

    पाने वाला कभी न जानेगा
    कैसा लगता है हार कर तुमको

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    चले आओ मुझे मिलने कभी छुपकर ज़माने से
    बहुत ही थक गया हूँ मैं तुम्हें हर पल बुलाने से

    करूँ कब तक तेरी बातें चराग़ों से अँधेरों से
    तू कर आकर रिहाई अब मेरी इस क़ैद ख़ाने से

    तुम्हें देखे बिना भी इश्क़ करते हैं तुम्हीं से हम
    मुहब्बत मिट नहीं जाती किसी के दूर जाने से

    कभी ख़ुद से, ही घंटों तक, तुम्हारी बात करते हैं
    अकेले हो गये कितने तुम्हारे छोड़ जाने से

    मुहब्बत हो अगर सच्ची कभी बूढ़ी नहीं होती
    वो दिन भी लौट आएँगे तुम्हारे लौट आने से

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