ग़म ने उस की रोटी तक है छीन ली
खा नहीं पाता कभी वो पेट भर
खा नहीं पाता कभी वो पेट भर
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दिल तुम्हें आज भी बुलाता है
और फिर थक के बैठ जाता है
और फिर थक के बैठ जाता है
मैं नहीं चाहता की याद आऊँ
याद जैसा मुझे वो आता है
कोई वा'दा किसी से हो ही क्यूँ
कौन वादों को अब निभाता है
बात होती है भूलने की मगर
कब किसे कोई भूल पाता है
अपने ख़्वाबों को बेचकर कोई
चार पैसे कहीं कमाता है
बात दिल की तू दिल में रहने दे
क्यूँ तमाशा इसे बनाता है
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चले आओ मुझे मिलने कभी छुप कर ज़माने से
बहुत ही थक गया हूँ मैं तुम्हें हर पल बुलाने से
बहुत ही थक गया हूँ मैं तुम्हें हर पल बुलाने से
करूँ कब तक तेरी बातें चराग़ों से अँधेरों से
तू कर आ कर रिहाई अब मेरी इस क़ैद ख़ाने से
तुम्हें देखे बिना भी इश्क़ करते हैं तुम्हीं से हम
मुहब्बत मिट नहीं जाती किसी के दूर जाने से
कभी ख़ुद से, ही घंटों तक, तुम्हारी बात करते हैं
अकेले हो गए कितने तुम्हारे छोड़ जाने से
मुहब्बत हो अगर सच्ची कभी बूढ़ी नहीं होती
वो दिन भी लौट आएँगे तुम्हारे लौट आने से
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