इक मुहब्बत इक बग़ावत इक अदावत और मैं
डूब कर निकला कहाँ फिर चैन राहत और मैं
डूब कर निकला कहाँ फिर चैन राहत और मैं
कितने चेहरे एक चेहरे पर लगा ख़ुद ग़ुम हुई
आइने से जूझता साकित हक़ीक़त और मैं
सब्र और ईमान से प्याला मिली हाला नहीं
फिर तराज़ू पर पड़े हैं दीन दौलत और मैं
तोड़ लाना है ख़ला के शाख़ से कोकब हसीं
गिरते पड़ते बढ़ रहे हैं इश्क़ हिम्मत और मैं
कोह से टकरा रही है ज़िंदगी एक बार फिर
जीतता है कौन देखें या कि क़िस्मत और मैं
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बा'द मुद्दत के हसीं रात सुहानी आई
तेरे दीदार से साँसों में रवानी आई
तेरे दीदार से साँसों में रवानी आई
नूर फैला है अमावस में ग़ज़ब का देखो
चाँदनी ओढ़ अँधेरे में दिवानी आई
मंज़िलें एक थीं अपनी भी कभी चाहत में
मुख़्तलिफ़ मोड़ पे लेकिन ये कहानी आई
बे-वफ़ा तुम न हुए हम भी दग़ाबाज़ न थे
उलझनें दिल की हमें बस न मिटानी आई
'प्रीत' बरसात में मिट्टी की महक आई है
बह के फिर गाँव से कुछ याद पुरानी आई
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याद है थोड़ा बहुत क़िस्सा पुराना हो गया
इक झरोखा था यहाँ गुज़रा ज़माना हो गया
इक झरोखा था यहाँ गुज़रा ज़माना हो गया
चाँदनी में जो मिला था आब-ए-शीशा की तरह
वो अमावस रात में बस इक फ़साना हो गया
एक साया साथ चलता था बदन से भी क़रीब
शाम ढलते क्यूँ न जाने उस का जाना हो गया
अब तुम्हारी याद की किर्चें नहीं चुभतीं मुझे
इश्क़ का वो हादसा बिसरा तराना हो गया
अब किसी वादे में दावों में नहीं आना मुझे
सोचती हूँ सोचने में ही ज़माना हो गया
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बड़ी ही जानलेवा सी असर रखतीं तेरी आँखें
सुकूँ को छीन कर दिल पर सितम ढातीं तेरी आँखें
सुकूँ को छीन कर दिल पर सितम ढातीं तेरी आँखें
किसी नायाब हीरे सी हिफ़ाज़त जिस की मैं ने की
चुरा लेती थी उस दिल को फ़रेबी थीं तेरी आँखें
भरी रहती है सजदे से दुआ के अश्क में भीगी
किसी मंदिर में दीपक सी मुझे लगतीं तेरी आँखें
मुसीबत कितनी भी आए मैं उस से जीत जाऊँगी
लगा काजल का इक टीका बला हरतीं तेरी आँखें
गुज़ारी ज़िंदगी सब धूप की बैठक में जल जल कर
भरी गर्मी में शीतल छाँव सी रहतीं तेरी आँखें
ज़बाँ जो कह नहीं पाती कई पोशीदा अफ़साने
वो तेरा हाल-ए-दिल बे ख़ौफ़ हो कहतीं तेरी आँखें
अरे लहरें ख़ुमारी में गगन के पार जाती हैं
समुंदर का भी प्याला जाम से भरतीं तेरी आँखें
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बज़्म प्याला शे'र शाइ'र और मैं
बिखरी हाला बीता मंज़र और मैं
बिखरी हाला बीता मंज़र और मैं
ख़त भी भीगे जाम भी छल का बहुत
रात रोई नम था बिस्तर और मैं
दर्द की कश्ती भँवर में आ गई
सब्र टूटा डूबा लंगर और मैं
दिल से जो तुम ने गिराया बे-वफ़ा
टुकड़ा टुकड़ा टूटा अख़्तर और मैं
हिज्र की आँधी में सब उजड़ा यहाँ
बस बचे वीरान मरमर और मैं
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