ग़ालिब की बातें तुम ज़रा सी ही मगर दिल से सुनो
है ज़िंदगी को कैसे ग़ज़लों में उतारा ये सुनो
है ज़िंदगी को कैसे ग़ज़लों में उतारा ये सुनो
हर लफ़्ज़ अपने में ज़माने को बयाँ करता लिखा
ग़ालिब ने ग़ालिब को लिखा कितने क़रीने से सुनो
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बात को दिल में दबाए रखता हूँ
ऐसे मैं ख़ुद को सताए रखता हूँ
ऐसे मैं ख़ुद को सताए रखता हूँ
सब्ज़ क्यूँ करते हो ज़ख़्मों को मेरे
जब उन्हें मैं ही छुपाए रखता हूँ
ज़िंदगी की कश्ती यूँ चलती है अब
राब्ता ग़म से बनाए रखता हूँ
क्या तुम्हें मालूम हैं ख़ुद को फ़क़त
उस के अबरू से बचाए रखता हूँ
कर ली है फूलों ने मुझ से दूरियाँ
चाँद को जबसे रिझाए रखता हूँ
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मुश्क आने मौत की मुझ को लगी
इश्क़ दुनिया करने ही मुझ को लगी
इश्क़ दुनिया करने ही मुझ को लगी
क्या कहूँ मैं ऐसी नादानी को अब
प्यार में फिर छलने भी मुझ को लगी
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दिल दुखाती बात है उस की यक़ीनन
ख़ाक होना जात है उस की यक़ीनन
ख़ाक होना जात है उस की यक़ीनन
मौत आएगी यहाँ सबकी सुनो पर
इक यही तो मात है उस की यक़ीनन
यार तोड़ा है मिरा दिल हर किसी ने
देख ये सौग़ात है उस की यक़ीनन
छाया है अब्र-ए-सियह अब अश्कों का फिर
आँख से बरसात है उस की यक़ीनन
इक परिंदा क़ैद हो रक्खा था यारो
यार ये इंसात है उस की यक़ीनन
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