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ये मत पूछो के हसरत हम ने इस दिल की कहाँ रख दी
हमारी चीज़ थी हम ने जहाँ चाही वहाँ रख दी
हमारी चीज़ थी हम ने जहाँ चाही वहाँ रख दी
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इस तरहा तेरे होश उड़ाएंगे किसी दिन
महफ़िल में ग़ज़ल हम जो सुनाएंगे किसी दिन
महफ़िल में ग़ज़ल हम जो सुनाएंगे किसी दिन
ये सोच के अब तक रहे बीमार, के हम को
वो शरबत-ए-दीदार पिलाएँगे किसी दिन
है मुझ को यकी इश्क़ में उस शोख अदा के
हम शहर से क्या जान से जाएँगे किसी दिन
माना के है इस काम में रुसवाई भी, लेकिन
हम बार-ए-मोहब्बत भी उठाएँगे किसी दिन
क्या चीज़ है रह रह के उन्हें तकना बताओ
वो हम को गुनहगार बनाएँगे किसी दिन
जो ज़ुल्फ़े परिशान में उलझें हैं उन्हें हम
आदाब-ए-जूनु याद दिलाएँगे किसी दिन
जो देखे हैं अल्ताफ़ हिक़ारत कि नज़र से
वो लोग ही पलकों पे बिठाएंगे किसी दिन
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मेरे हिस्से में दिवारें थी, किसी को दर दिए
यूँ न जाने हम ने घर के कितने टुकड़े कर दिए
यूँ न जाने हम ने घर के कितने टुकड़े कर दिए
हर किसी को लुत्फ़ आजाये यहाँ ये सोच कर
हम ने इन अलफ़ाज़ को फिर शे'र के पैकर दिए
हाए क्या दौर-ए-जिहालत है! नए शाइ'र यहाँ
उस्से आगे उड़ रहे हैं जिस ने इनको पर दिए
हाँ वही इक शख़्स जिस पर था भरोसा भी बहुत
बस उसी ने दर्द बख्शा, दिल के टुकड़े कर दिए
आज वो ख़ुश है नुमाइश कर के ज़ख़्मों कि मिरे
कल जिसे मैं ने हिफाज़त के लिए पत्थर दिए
इक वही हम को मनाज़िर में कही दिख ना सका
जिस ने इन आँखों को ऐसे ख़ूब तर मंज़र दिए
बेपर-ओ-बाली कि खाई में गिरे थे जो कभी
हम ने उन को भी उड़ानो के लिए शह पर दिए
ग़म है दुनिया में नहीं कर पाए कुछ अल्ताफ़ पर
हम ने रौशन दान में चिडिया को नन्हें घर दिए
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