दिल नहीं लग रहा है मेरा कही
तुम अभी भी ख़फ़ा हो क्या मुझ से
तुम अभी भी ख़फ़ा हो क्या मुझ से
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दस्त हक़ में मिरे उठा दो बस
मुझ को पैसे नहीं दुआ दो बस
मुझ को पैसे नहीं दुआ दो बस
उस की तस्वीर को बनाते वक़्त
मुझ को तस्वीर से हटा दो बस
मूड मेरा बहुत ख़राब है दोस्त
कोई अच्छी ग़ज़ल सुना दो बस
मैं किसी और का न हो पाया
कोई जा कर उसे बता दो बस
कल जो लड़की मिली थी साड़ी में
मुझ को उस का कोई पता दो बस
इश्क़ उकता गया है दर्शन से
तुम बदन का मुझे पता दो बस
आख़िरी चीज़ भी करो 'कातिब'
उठ के सूरज को अब बुझा दो बस
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धोखा फ़रेब और दगा लिखने लगा हूँ मैं
इस दिल के साथ जो हुआ लिखने लगा हूँ मैं
इस दिल के साथ जो हुआ लिखने लगा हूँ मैं
उस की हवेली इश्क़ की जिस कूचे में बनी
उस दिल गली का रास्ता लिखने लगा हूँ मैं
अच्छे भले इंसान को जीते जी मार दे
है इश्क़ वैसा हादसा लिखने लगा हूँ मैं
उन नज़रों के गिरफ़्त में जब से मैं आया हूँ
कुछ ऐन शीन काफ़ सा लिखने लगा हूँ मैं
इस इक भरम में बरसो रहा दिल मेरा के वो
बस मेरा है जिसे ख़ुदा लिखने लगा हूँ मैं
ख़ुद के क़रीब देखना फिर देखना जुदा
है मसअला ख़याल का लिखने लगा हूँ मैं
इस रोग का इलाज तो मुमकिन नहीं है दोस्त
सो मशवरा है हिज़्र का लिखने लगा हूँ मैं
इक शख़्स मेरे दिल से जरा दूर क्या हुआ
हर चेहरे को ही बे-वफ़ा लिखने लगा हूँ मैं
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ये भँवर है आप की दुनिया नहीं
इस पते पर अब कोई रहता नहीं
इस पते पर अब कोई रहता नहीं
एक ही ग़म एक ही तकलीफ है
जो कभी मेरा था,अब मेरा नहीं
जब ज़रूरत थी तुम्हारी, तुम न थे
साथ रहते तुम तो कुछ खोता नहीं
मैं मुहब्बत फिर से कर तो लूँ मगर
ये तमाशा हम से अब होगा नहीं
एक ग़म दिल में दबाए जी रहा
एक चेहरा है जिसे भूला नहीं
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एक ही छत के नीचे रहते हैं
वहशी आँखें मिरा पुजारी दिल
मेरी तन्हाई के हैं दो साथी
इक मैं हूँ एक मेरा भारी दिल
ये मुझे ही पता है के कैसे
तेरे बिन ज़िन्दगी गुज़ारी दिल
इक ज़माना था इश्क़ का, जब लोग
बात पर मरते थे तुम्हारी दिल
तुझ को इक दिन बहुत रुलाएगा
तेरा ये ज़ूद ए'तिबारी दिल
खूब करते रहो ख़ता 'कातिब'
ग़लतियाँ गिन रहा है सारी दिल
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तुम को खो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
दूर हो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
दूर हो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
दर्द कम होता है रो लेने से गर
फिर क्यूँ रो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
ऐसे कुछ काम भी थे ज़िन्दगी में
यार जो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
इश्क़ ऐसा गुनाह है जिस का
पाप धो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
क्यूँ झिझक हो हमें ये कहने में
तेरे होकर के ख़ुश नहीं हैं हम
हाए इक मुस्कुराते चेहरे में
ग़म पिरो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
तेरे दरिया-ए-इश्क़ में अपना
दिल डुबो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
यार तेरे बिना जवानी का
बोझ ढो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
इक ख़ुशी के गुबारे में अपना
ग़म चुभो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
जान-ए-जाँ अब फ़िराक़ में तेरी
शब भिगो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
किस से शिकवा करें कि क्यूँ ख़ुद को
इक से दो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
माँग में तेरी अपने सपनों का
खू़ँ सँजो कर के ख़ुश नहीं है हम
डूबने वाले जानते ही नहीं
लाश ढो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
दुनिया वालों तुम्हारी दुनिया में
साँसे ढो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
इस मुहब्बत के दश्त में "कातिब"
ज़हर बो कर के ख़ुश नहीं हैं हम
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ज़ेहन दिल ज़बान उस का ही ग़ुलाम अब भी है
या'नी मेरे रूह में वो एक नाम अब भी है
या'नी मेरे रूह में वो एक नाम अब भी है
इब्तिदा-ए-इश्क़ में जो ढूँढ़ती थी बस मुझे
उस नज़र का याद आखरी सलाम अब भी है
मैं तुम्हें अभी ये रौशनी न दे सकूँगा दोस्त
मेरे जिस्म से लिपट के बैठी शाम अब भी है
मेरे जैसों को चुनो तो ये पता चले तुम्हें
शहर में बचा हुआ वफ़ा का नाम अब भी है
एक शख़्स से हुए हैं बरसों बिछड़े फिर भी यार
उस के ही लिए धड़कना दिल का काम अब भी है
तेरे सजदे करने वाले एक लड़के के लिए
इश्क़ विश्क़ और किसी से भी हराम अब भी है
बस उस एक लड़की का ख़याल आता है मुझे
जिस के वास्ते ज़रूरी ये निज़ाम अब भी है
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बोलना है तो आई लव यूँ बोल
हुक्म दे लब को आई लव यूँ बोल
हुक्म दे लब को आई लव यूँ बोल
वरना मर जाऊँगा मैं उस के बिन
उस को समझाओ आई लव यूँ बोल
उस ने समझाया इश्क़ में कई बार
फ़ोन रक्खो तो आई लव यूँ बोल
मुझ को हर रोज़ बोसे के लिए तुम
अब न तरसाओ आई लव यूँ बोल
दिल के अरमान मत छुपा 'कातिब'
जा के तू उस को आई लव यूँ बोल
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