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"बुत-तराश"
तुम्हारे दिल ने हमेशा मुझ से शिकायतें की
कि मेरे सीने में दिल नहीं है
जो दूरियाँ जाँ-गुसिल नहीं हैं
मैं चाहता हूँ
कभी तुम अपनी शिकायतों के तमाम ख़ंजर
मेरे बदन में शरीक कर के
बड़े बड़े से सुराख कर दो
और उन में देखो
मुझे यक़ीं है
तुम्हें वहाँ इक
हया तक़ल्लुफ़ झिझक का मारा
रिवाज-ओ-रस्म-ए-जहाँ का क़ैदी
मिलेगा जो ख़ुद
शदीद फ़ुर्क़त के पत्थरों पर
तुम्हारी सूरत निखारता है
तुम्हारे बुत को तराशता है
Read Fullकि मेरे सीने में दिल नहीं है
जो दूरियाँ जाँ-गुसिल नहीं हैं
मैं चाहता हूँ
कभी तुम अपनी शिकायतों के तमाम ख़ंजर
मेरे बदन में शरीक कर के
बड़े बड़े से सुराख कर दो
और उन में देखो
मुझे यक़ीं है
तुम्हें वहाँ इक
हया तक़ल्लुफ़ झिझक का मारा
रिवाज-ओ-रस्म-ए-जहाँ का क़ैदी
मिलेगा जो ख़ुद
शदीद फ़ुर्क़त के पत्थरों पर
तुम्हारी सूरत निखारता है
तुम्हारे बुत को तराशता है
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तू भी गर बे-वफ़ाई कर जाए
तो मेरा क़र्ज़ ही उतर जाए
तो मेरा क़र्ज़ ही उतर जाए
ख़ुद-कुशी की सहूलतें तब हैं
जब कोई हादसा गुज़र जाए
ज़िन्दगी एक शाहज़ादी है
शाहज़ादी का दिल न भर जाए
मैं अगर ज़ब्त करने पर आऊँ
तिश्नगी तिश्नगी से मर जाए
वस्ल उस कैफ़ियत में लाज़िम है
जब हवस का नशा उतर जाए
या उभर आए आज वो सूरत
या मेरे हाथ से हुनर जाए
फिर किसी हुस्न की इनायत हो
फिर कोई सानेहा गुज़र जाए
हसरतों से छलक रहा है दिल
कोई ये जाम ख़ाली कर जाए
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सर्द रुतों की रंगत जब चारों जानिब बढ़ जाती है
इक कश्मीरन पश्मीना की शॉल बेचने आती है
इक कश्मीरन पश्मीना की शॉल बेचने आती है
लोग ये इक जुमला दोहरा कर मुझ से कटते जाते हैं
दिल का अच्छा शख़्स है लेकिन थोड़ा सा जज़्बाती है
उस से बिछड़े एक ज़माना गुज़र गया पर ख़्वाबों में
अक्सर वो मेरे शाने पर सर रख कर सो जाती है
मुझ को अपनी ज़ात से वहशत होती है जब देखता हूँ
धूप तेरा चेहरा कितनी आसानी से छू आती है
एक मुहब्बत है जिस का इज़हार नहीं होता मुझ से
एक मसाफ़त है जो मुझ से ख़त्म नहीं हो पाती है
एक ख़ुशी होंठों पे जो आने से है महरूम मेरे
एक उदासी है जो मुझ
में रक़्स नहीं कर पाती है
कभी तो उस के छूने भर से ऐसे करिश्में होते हैं
शाख़-ए-दिल पर पतझड़ के मौसम में कोपल आती है
रफ़्ता रफ़्ता टूट रहे हैं गुंबद उस की यादों के
धीरे धीरे दिल की दिल्ली सूनी होती जाती है
इतने पेच-ओ-ख़म होते हैं कुछ लोगों के जीवन में
इक लम्हा भी ग़ौर करो तो हैरानी बढ़ जाती है
कल किस की आग़ोश में गुज़री थी मेरी आवारा शब
ये किस के बिस्तर की ख़ुशबू मेरे बदन से आती है
मैं समझा था ये चिंगारी मुझ को राख बना देगी
लेकिन ये लड़की तो मेरी फ़ितरी आग बुझाती है
मुझ से वस्ल के लम्हों में भी कैसा शल है उस का बदन
आग के छूने से तो सुना था हर इक शय जल जाती है
ला-हासिल चेहरों के यूँ ही ख़्वाब न देखा कर 'ज़रख़ेज़'
ये वो इमारत है जो आँखें खुलते ही ढह जाती है
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