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वो हम से दूर होकर भी हमारे दिल में रहते हैं
अब इस से बेश एजाज़-ए-मुहब्बत और क्या होगा
अब इस से बेश एजाज़-ए-मुहब्बत और क्या होगा
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अब मेरे दर्द की और ग़म की बड़ी है यारी
ज़ख़्म कितना भी हो गहरा मैं वो सह जाता हूँ
ज़ख़्म कितना भी हो गहरा मैं वो सह जाता हूँ
जब वो कहती है 'लकी' मुझ को भुला तुम दोगे
ग़ैर मुमकिन है रवानी में ये कह जाता हूँ
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मुझ को मेरा पता नहीं मिलता
इश्क़ मुझ को भी खा गया शायद
इश्क़ मुझ को भी खा गया शायद
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