ज़िन्दगी में इश्क़ का अधूरापन भी झूठा है
मेहबूब के ना होने का सूनापन भी झूठा है
मेहबूब के ना होने का सूनापन भी झूठा है
गर जो हो जाता है भूले से भी दीदार उस का
उसे देख लेने का उतावलापन भी झूठा है
महफ़िल में भी खोए रहते हो उस की यादों में
यार की यादों का ये अकेलापन भी झूठा है
मोहब्बत की ख़ातिर कैसे पागल से फिरते हैं
ये आशिकों के प्यार का आवारापन भी झूठा है
कुछ मजबूरियाँ रहीं होंगी उस की जो चला गया
उस से नफ़रत करने का ये दिखावापन भी झूठा है
कभी जो फ़ुर्सत मिले तो ख़ुद से भी मिल लेना
समझ जाओगे "निहार", ये दीवानापन भी झूठा है
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लबों पर हँसी है तो दिल में ये कैसी चुभन है
अरे ये मोहब्बत भी दोस्तों इक अजीब फ़न है
अरे ये मोहब्बत भी दोस्तों इक अजीब फ़न है
रूह से रूह का इश्क़ कहाँ मिलता है अब "निहार"
आजकल जिस्मानी इश्क़ का ही दौर ए चलन है
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ज़िन्दगी के सफ़र में ख़ुशी और ग़म का अपना अपना क़िस्सा है
अच्छा नहीं तो बुरा ही सही, पर वो शख़्स मेरी कहानी का हिस्सा है
अच्छा नहीं तो बुरा ही सही, पर वो शख़्स मेरी कहानी का हिस्सा है
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बहुत तन्हा कट रहा है ये ज़िन्दगी का सफ़र
मेरे कदम से कदम मिलाओ तो कुछ बात बने
मेरे हिस्से में नहीं कुछ फकत अंधेरे के सिवा
तुम जो इक दिया जलाओ तो कुछ बात बने
मेरे ही ख़्वाबों के टुकड़े आँखों में चुभने लगे हैं
तुम कोई नया ख़्वाब दिखाओ तो कुछ बात बने
इंसां के घरों के दरवाज़ों ने परिंदों को बेघर कर दिया
"निहार" हर रोज़ इक पौधा लगाओ तो कुछ बात बने
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यूँ ख़ामोश बैठे किस उलझन में हो
इनकार है या इकरार है बता दो हमें
इनकार है या इकरार है बता दो हमें
मोहब्बत हम ने की है तुम से
गर इश्क़ ख़ता है तो सज़ा दो हमें
मरता नहीं इस जहाँ में कोई किसी के बगैर
गर ज़िंदा हो तो इत्तिला दो हमें
सुना है हमारे ख़तों को जला दिए तुम ने
गर जला सको तो जला दो हमें
ये जो दुनिया इश्क़ के खिलाफ है, कहाँ है?
ऐलान-ए-जंग करनी है , कोई पता दो हमें
लड़ाई मुश्किल है तो क्या, हौसले बुलंद हैं
बात आजमाइश की है तो आज़मा लो हमें
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