काम अच्छा तो कर गया हूँ मैं
क्यूँ नज़र से उतर गया हूँ मैं
उसको अहसास हो मेरे दुख का
कर के वादा मुकर गया हूँ मैं
कोई मुझको समेट ले आकर
ज़र्रा-ज़र्रा बिखर गया हूँ मैं
रोज़े महशर हो क्या ख़ुदा जाने
जो न करना था कर गया हूँ मैं
चढ़ के सर बोलते हैं तिनके भी
जब से यारों सुधर गया हूँ मैं
मैं तुझ से मिलने पर ऐसा हुआ हूँ
वगरना आदमी अच्छा भला हूँ
धड़कता हूँ किसी के दिल में अक्सर
किसी टूटे हुए दिल की सदा हूँ
मुझे देखो मेरा ये हाल देखो
तुम्हारे इश्क़ मे क्या हो गया हूँ
जो पूछा अर्श पर नाले है किसके
सदा आई कि मैं मुफ़लिस की दुआ हूँ
छ्लक उठते है आँखों से मेरे दुख
मैं दर्दो ग़म से कितना भर गया हूँ
मुसाफ़िर तू अगर है तो गुज़र जा
मेरा क्या है कि मैं इक रास्ता हूँ
मिलूँगा हश्र मे तुझ से ऐ साहिल
तिरी दुनिया से अब मैं जा रहा हूँ
निकल के दिल से आँखों के जो शहर में हुए थे यकजा
अब उन दुखों को आसुँओं की शक्ल में बहा रहा हूँ
मेरे भी पाओ रुक रहे थे गांव से जाते हुए
जब उसकी आँख में आंसू थे हाथ हिलाते हुए
तू मेरे खद्दो खाल बना भी ले मुसव्वीर मगर
इक उम्र ही लगेगी मेरी शोख़ी बनाते हुए
इलज़ाम आखिरस उसी इंसाँ पे लगाया गया
वो जिसके हाथ जल गए थे आग बुझाते हुए
ख्वाहिश को रौन्दना पड़ता है खुद पैरों तले
घर की हर इक जरुरतो का भार उठाते हुए
मेरे नजूमी राज़ कहीं खोल न दे इस लिए
अक्सर झिझकता हूँ अपना हाथ दिखाते हुए
तक़ाज़ा है इक और दिखाओगे क्या-क्या
ज़मीं-आसमाँ सर उठाओगे क्या-क्या
हैं दरिया भी, सहरा भी, ग़म भी, ख़ुशी भी
इन आँखों में हमदम छुपाओगे क्या-क्या
मुझे पढ़ने वाले कहेंगे बुरा सब
फ़साने में मुझको बताओगे क्या-क्या
है ना-काम कोशिश भुलाने की मुझको
मेरी तुम निशानी मिटाओगे क्या-क्या
गिरेबां तेरा चाक हातो मे ज़ंजीर
'रज़ा' इश्क़ मे और कमाओगे क्या-क्या