हवा जंगल घटा रोई नदी सूखी हुआ क्या है
उजाड़ा है चमन जिस ने भला उस की सज़ा क्या है
सितारों पर जो रहते थे गली में फिर रहे साहब
सियासी बात लगती है पता कर माजरा क्या है
लगा कर आग सीनों में जिन्होंने रोटियाँ सेकीं
खुरच कर ज़ख़्म वो हर बार पूछे अब हुआ क्या है
सिसक कर तीरगी में उम्र को गुमनाम क्यूँ करना
चराग़ों की तरह जल देख जीने में मज़ा क्या है
बहुत उलझे हैं मंसूबे समझना 'प्रीत' है मुश्किल
यहाँ ख़ुदग़र्ज़ दुनिया में वफ़ा क्या है दग़ा क्या है
— Ragini Preet















