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है दिल में जुनूँ-ख़ेज़ परस्तिश का इरादा
ऐसे में मुनासिब नहीं रंजिश का इरादा
ऐसे में मुनासिब नहीं रंजिश का इरादा
जलने को है तय्यार मता-ए-दिल-ओ-जाँ फिर
अफ़्सोस मगर सर्द है आतिश का इरादा
मिट्टी का घरौंदा बड़ी मुश्किल से बना है
ऐ काश बदल दे कोई बारिश का इरादा
यूँ खुल के सर-ए-आम न मिल मुझ से मिरे दोस्त
दुनिया में है ज़िंदा अभी साज़िश का इरादा
कश्कोल मोहब्बत की तलब फिर भड़क उट्ठी
देखा जो ब-ज़िद उस में नवाज़िश का इरादा
उस ने बड़ा मोहतात रवय्या रखा फिर भी
लहजे से झलकता रहा ख़्वाहिश का इरादा
उस दिल का इलाक़ा सही मेरे लिए ममनूअ'
बदला न ब-हर-हाल रिहाइश का इरादा
है म'अरका-आरा जो 'ख़याल' आज ब-ज़ाहिर
रखता है पस-ए-तैश गुज़ारिश का इरादा
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मोहब्बतों की मसाफ़त से कट के देखते क्या
मुसाफ़िर-ए-शब-ए-हिज्राँ पलट के देखते क्या
मुसाफ़िर-ए-शब-ए-हिज्राँ पलट के देखते क्या
सुरूर-ए-इश्क़ में गुम हो गए थे हम दोनों
हवा-ए-दामन-ए-शब से लिपट के देखते क्या
तिलिस्म-ए-यार रग ओ पय में ढल रहा था, हम
नशात ओ ग़म के सहीफ़े उलट के देखते क्या
बहार-ए-नौ को जनम दे रही थी वस्ल की शब
हम आफ़ियत की रुतों में सिमट के देखते क्या
था सैल-ए-हसरत-ए-दिल दुश्मन-ए-हयात मगर
रह-ए-बक़ा भी उसी में थी हट के देखते क्या
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कितना जाँ-सोज़ है मंज़र मिरी तन्हाई का
हौसला मुझ में नहीं अंजुमन-आराई का
हौसला मुझ में नहीं अंजुमन-आराई का
मैं ने समझा था जिसे बाइस-ए-तस्कीन-ए-नज़र
उस ने सामान किया है मिरी रुस्वाई का
मेरी बातों में नया रंग कहाँ से आए
मेरे दिल में भी है इक ज़ख़्म शनासाई का
बात तो जब है कि जज़्बों से सदाक़त फूटे
यूँ तो दावा है हर इक शख़्स को सच्चाई का
रूह में जज़्बा-ए-उलफ़त को फ़ुज़ूँ पाता हूँ
जब ख़याल आता है मुझ को तिरी रा'नाई का
ऐ 'ख़याल' आतिश-ए-एहसास भड़क जाएगी
आप दावा न करें धूप में दानाई का
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