बुझती शम्अ' की सूरत क्यूँँ अफ़्सुर्दा खड़े हो खिड़की में

देखो शाम है किस दर्जा दिलकश इस धूप की वर्दी में

वहम-ओ-गुमाँ के सहराओं में फूल खिले तिरी यादों के
और चराग़ाँ दूर तिलक है साँसों की इस वादी में

क़हर-ओ-ग़ज़ब के मिम्बर पर हाथों में लिए कश्कोल-ए-वफ़ा
झाँक रहा था सूरज भी कल ग़ौर से एक सुराही में

दूर खड़ा हो कर मैं इस लिए पहरों देखता रहता हूँ
क़ैद बहुत सी यादें हैं मिरी इस वीरान हवेली में

तहों की प्यास भी सतह पर अब साफ़ दिखाई देती है
ढूँड रहे हैं जाने क्या ये बादल नीली छतरी में

एक है अंदेशा मुझ को कहीं मेरे मर जाने के ब'अद
बेच न दें मेरे घर वाले मिरी क़ीमती ग़ज़लें रद्दी में

रंग और ख़ुश्बू की मानिंद है मेरा सरापा भी साहिब
क़ैद रखेगा आख़िर कब तक वक़्त मुझे यूँ मुट्ठी में

बहर-ए-मोहब्बत के साहिल की सैर बहुत कर ली हम ने
आओ ज़रा अब हम भी देखें बैठ के प्यार की कश्ती में

हिर्स-ओ-हवस के सारे पुजारी एक जगह हैं आज जम'अ
वक़्त की शाख़ पे शायद कोई फूल खिला है जल्दी में

— Rafique Khayal

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