इतनी फ़ुर्सत नहीं उस पैकर-ए-पिंदार के पास

बन के आए वो मसीहा किसी बीमार के पास

गर यूँही वहशतें रक़्साँ रहीं दालानों में
कोई साया न रहेगा किसी दीवार के पास

रोज़ आँखों को नया तर्ज़-ए-सुख़न मिलता है
रोज़ जाता हूँ किसी यार-ए-तरह-दार के पास

फ़स्ल-ए-ग़म देख के नम-दीदा हुआ चर्ख़-ए-फ़लक
शायद आँखें ही नहीं आइना-बरदार के पास

मेरी दीवानगी ख़्वाबों से बग़ल-गीर हुई
दश्त आबाद किया जब किसी गुलज़ार के पास

रंग-ओ-निकहत के ख़ज़ाने भी ज़मीं-बोस हुए
चल के ख़ुद आने लगी ख़ुश्बू ख़रीदार के पास

ऐ 'ख़याल' अपने इरादों को तवाना रक्खो
मुफ़्लिसी आती नहीं है किसी फ़नकार के पास

— Rafique Khayal

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