बहुत मुश्किल सही लेकिन ब-सद मुश्किल भी देखेंगे
कि अनवार-ए-हक़ीक़त तालिबान-ए-दिल भी देखेंगे
कि अनवार-ए-हक़ीक़त तालिबान-ए-दिल भी देखेंगे
ख़ुदा तौफ़ीक़ दे हम को तो दिल को दिल भी देखेंगे
इन्हीं आँखों से हम आसान हर मुश्किल भी देखेंगे
न कामिल ज़ौक़-ए-नज़ारा न शौक़-ए-जादा-पैमाई
अगर कामिल तलब है तो मज़ाक़-ए-दिल भी देखेंगे
वो कश्ती आज जो टकरा रही है मौज-ए-तूफ़ाँ से
उसी कश्ती को हम इक दिन सर-ए-साहिल भी देखेंगे
दर-ए-हैदर पे 'क़ैसर' सर झुका किसरा का क़ैसर का
गदा-ए-कू-ए-हैदर हुस्न-ए-मुस्तक़बिल भी देखेंगे
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मुद्दआ' दिल का कभी लब आश्ना होता नहीं इश्क़ का मफ़्हूम लफ़्ज़ों में अदा होता नहीं
हुस्न वालों का करम दिल पर रवा होता नहीं
ये ख़बर होती तो उन पर मुब्तला होता नहीं
मौत से बद-तर है तेरे आसरे पर ज़िंदगी
काश कोई ज़िंदगी का आसरा होता नहीं
आप के हमराह सब दामन-कशाँ होने लगे
आज दिल में दर्द भी कल से सिवा होता नहीं
हिज्र का ग़म हर घड़ी है साथ साए की तरह
या'नी तारीकी में भी मुझ से जुदा होता नहीं
मैं गदा-ए-कू-ए-जानाँ हूँ तो सब हैं ता'ना-ज़न
वर्ना 'क़ैसर' आलम-ए-इम्काँ में क्या होता नहीं
Read Fullये ख़बर होती तो उन पर मुब्तला होता नहीं
मौत से बद-तर है तेरे आसरे पर ज़िंदगी
काश कोई ज़िंदगी का आसरा होता नहीं
आप के हमराह सब दामन-कशाँ होने लगे
आज दिल में दर्द भी कल से सिवा होता नहीं
हिज्र का ग़म हर घड़ी है साथ साए की तरह
या'नी तारीकी में भी मुझ से जुदा होता नहीं
मैं गदा-ए-कू-ए-जानाँ हूँ तो सब हैं ता'ना-ज़न
वर्ना 'क़ैसर' आलम-ए-इम्काँ में क्या होता नहीं
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तेरी बे-रुख़ी मिरी मौत थी हुआ इल्तिफ़ात कभी कभी
तिरे इल्तिफ़ात की ख़ैर हो कि मिली हयात कभी कभी
तिरे इल्तिफ़ात की ख़ैर हो कि मिली हयात कभी कभी
रह-ए-आरज़ू में कहीं कहीं मुझे रोक देते हैं हादसे
ग़म-ए-इश्क़ है मिरा मुस्तक़िल ग़म-ए-काएनात कभी कभी
मिरी जुम्बिश-ए-लब-ए-ग़म-ज़दा जो तिरे मिज़ाज पे बार है
मिरे आँसुओं की ज़बाँ से सुन ग़म-ए-दिल की बात कभी कभी
नहीं एक हाल में कुछ मज़ा करो चाशनी भी मुझे अता
मिरी ज़िंदगी के सुकूत में नई वारदात कभी कभी
वो जहाँ कहीं नज़र आ गए बड़ा इत्तिफ़ाक़ हसीं रहा
मुझे तीरगी थी नसीब में मिली चाँद रात कभी कभी
मैं ज़मीं-नवर्द था इश्क़ में मगर ऐसे मोड़ भी आ गए
मह-ओ-मेहर तक मुझे ले गया सफ़र-ए-हयात कभी कभी
तिरा 'क़ैसर' अम्न-ओ-सुकूँ में भी न बचा फ़रेब-ए-जमाल से
तिरी इक निगाह से खुल गया दर-ए-हादसात कभी कभी
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ग़ज़ब है इक बुत-ए-काफ़िर-अदा ने लूट लिया
कि मुझ को बंदा बना कर ख़ुदा ने लूट लिया
कि मुझ को बंदा बना कर ख़ुदा ने लूट लिया
ये किस की बज़्म में कम-बख़्त ले गईं नज़रें
निगाह-ए-नाज़ ने मारा हया ने लूट लिया
जो दिल के पास था सरमाया-ए-हवा से-ओ-ख़िरद
नज़र ने छीन लिया और अदा ने लूट लिया
वो दिल कि जिस को बचाया था दैर-ओ-का'बास
तुम्हारे हुस्न-ए-वरा-उल-वरा ने लूट लिया
नहीं नसीब जो ताज-ए-शही को भी 'क़ैसर'
मज़ा वो कासा-ए-दस्त-ए-गदा ने लूट लिया
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बस अब हम से दिल-ए-शोरीदा-सर देखा नहीं जाता
ये तड़पाना तड़पना रात भर देखा नहीं जाता
ये तड़पाना तड़पना रात भर देखा नहीं जाता
हमें तरकीब ही नज़ारा-ए-रुख़ की नहीं आती
कि वो हैं देखने की शय मगर देखा नहीं जाता
ख़ुदा जुरअत न दे मुझ को किसी दिन लब-कुशाई की
कि मुझ से नाला-ए-महरूम-असर देखा नहीं जाता
ख़ुदा ने शर्म रख ली ज़ौक़-ए-नज़ारा की महफ़िल में
न जाने क्या सितम होता अगर देखा नहीं जाता
किसी गोशे में दिल के ढूँड उस के हुस्न-ए-यकजा को
वो शम्अ''-ए-शौक़ ले कर दर-ब-दर देखा नहीं जाता
बड़ी मुद्दत से पैदा कर रहा हूँ शौक़-ए-नज़्ज़ारा
ब-इत्मीनान-ए-दिल अब भी उधर देखा नहीं जाता
नहीं मालूम 'क़ैसर' इश्क़ ही इतना बुरा क्यूँ है
मेरी सम्त उन से जब कि इक नज़र देखा नहीं जाता
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फ़रियाद नहीं अश्क नहीं आह नहीं है
ऐ इश्क़ तिरा कोई हवा-ख़्वाह नहीं है
ऐ इश्क़ तिरा कोई हवा-ख़्वाह नहीं है
गो दर्द-ए-तमन्ना को बढ़ाता है तिरा ज़िक्र
दिल फिर भी तिरे नाम से आगाह नहीं है
ऐ हुस्न-ए-यक़ीं दैर-ओ-हरम की है फ़ज़ा तंग
इस दर से पलटने की कोई राह नहीं है
ये किस ने उड़ाई कि मुझे इश्क़ है तुम से
हाँ तुम को यक़ीं आए तो अफ़्वाह नहीं है
आसाइश-ए-तन रूह का आज़ार है 'क़ैसर'
दुनिया में ग़म-ए-इश्क़ से तनख़्वाह नहीं है
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आह मिज़राब-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
साज़ आहों की इबादत के सिवा कुछ भी नहीं
साज़ आहों की इबादत के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िंदगी पर जो कभी तुम ने इनायत की थी
अब वो तौफ़ीक़-ए-इनायत के सिवा कुछ भी नहीं
और हासिल हो कोई ग़म तो अजल को समझें
ज़िंदगी राज़-ए-हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं
और अफ़साना-ए-माज़ी में तो रखा क्या है
अब सुकूँ लफ़्ज़-ए-रिवायत के सिवा कुछ भी नहीं
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