Umair Najmi

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    याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी
    और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी

    अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था
    जब मेरे साथ था वो क्यूँ न कहा तब कुछ भी

    वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना
    हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

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    वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है
    जो उसका होता है समझो ग़ुलाम होता है

    किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़
    मोहब्बतों में हलाला हराम होता है

    इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में
    हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है

    तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत
    तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है

    कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम
    हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

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    किसी गली में किराए पे घर लिया उसने
    फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे

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    मैं चाहता था मुझसे बिछड़ कर वो ख़ुश रहे
    लेकिन वो ख़ुश हुआ तो बड़ा दुख हुआ मुझे

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    झुक के चलता हूँ कि क़द उसके बराबर न लगे
    दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे

    ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ायदा है
    आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे

    नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे
    ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे

    माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी
    उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे

    ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू
    कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे

    ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है
    इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे

    तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं
    कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

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    बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं
    लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं

    नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है
    मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं

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    कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक
    जैसे शदीद धुँध में बाग़ों की सैर हो

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    निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा
    अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है

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    जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते हैं कई
    पूछना था कि तेरा ध्यान भी रखता है कोई?

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    नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है
    मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं

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