चाँद सूरज मिरे घर आते हैं
क्या हसीं ख़्वाब नज़र आते हैं
क्या हसीं ख़्वाब नज़र आते हैं
मुझ से कहते हैं ठहर दम ले ले
राह में जितने शजर आते हैं
देखना मेरे तख़य्युल का कमाल
नहीं आते वो मगर आते हैं
बर्क़ हँसती है नशेमन पे मिरे
अब्र बा-दीदा-ए-तर आते हैं
देख कर अपने शिकस्ता दिल को
याद महलों के खंडर आते हैं
है बुरा हाल उन्हें क्या मालूम
वो भला कब मिरे घर आते हैं
सच है पथराव तभी होता है
जब दरख़्तों पे समर आते हैं
फ़ोन उठाएगी न 'परवीन' उस वक़्त
बच्चे स्कूल से घर आते हैं
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कोई किसी की तरह है कोई किसी की तरह
बस एक आप का जल्वा है आप ही की तरह
बस एक आप का जल्वा है आप ही की तरह
सिमट के ग़म के अँधेरे में लोग बैठ गए
मगर हमें तो बिखरना था रौशनी की तरह
ये मेरे ख़्वाब की जन्नत ये चाँद का आँगन
यहाँ तो धूप भी लगती है चाँदनी की तरह
नज़र में शक्ल तिरी सुब्ह-ए-आफ़्ताब-ए-अज़ल
ज़बाँ पे नाम तिरा हर्फ़-ए-आख़िरी की तरह
हम उन ख़ुदाओं से झुक कर नहीं मिला करते
जो आदमी से न मिलते हों आदमी की तरह
वो दर्द दुश्मन-ए-जाँ कैसे बन गया 'परवीन'
जिसे अज़ीज़ रखा हम ने ज़िंदगी की तरह
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फ़ैसले की उस घड़ी का इल्तवा अच्छा लगा
एक रिश्ता टूटने से बच गया अच्छा लगा
एक रिश्ता टूटने से बच गया अच्छा लगा
जान-ए-मन जान-ए-वफ़ा ख़त में लिखा अच्छा लगा
दूर से उस ने मुझे अपना कहा अच्छा लगा
मैं ने ग़म की धुन भी छेड़ी और ख़ुशी का राग भी
तुम बताओ गीत मेरा कौन सा अच्छा लगा
मुझ में क्या जौहर मिरे टूटे हुए आईने को
आज उस ने चाँद का टुकड़ा कहा अच्छा लगा
एक दिन आई तो फिर वापस न तन्हाई गई
मेरे उजड़े घर में उस को जाने क्या अच्छा लगा
दिल न छोड़ेगा ज़िदें ये तो वो बालक है जिसे
इक खिलौना मिल गया तो दूसरा अच्छा लगा
पेश कर दीं मैं ने फ़िक्र-ओ-फ़न की तस्वीरें हज़ार
ख़ुद पसंदों को मगर इक आईना अच्छा लगा
चाँदनी यादों की थी 'परवीन' आँसू क्यूँ बहाए
क्या कफ़न पे तुझ को मोती टाँकना अच्छा लगा
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धूप खिड़की से सिरहाने आई
चाँद ख़्वाबों के बुझाने आई
चाँद ख़्वाबों के बुझाने आई
हाए वो फूल से हँसते चेहरे
याद फिर उन की रुलाने आई
दिल चराग़ों के अभी लर्ज़ां हैं
फिर हवा होश उड़ाने आई
दिल सुलगता था शब-ए-ग़म यूँही
चाँदनी और जलाने आई
उठ हुई सुब्ह-ए-अज़ाँ की आवाज़
नींद से मुझ को जगाने आई
ओढ़ ली तू ने बरहना तहज़ीब
शर्म तुझ को न ज़माने आई
और 'परवीन' से हुज्जत कीजे
आप की अक़्ल ठिकाने आई
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चाँद पर क्यूँ मैं अकेली जाती
साथ कोई तो सहेली जाती
साथ कोई तो सहेली जाती
आओ मिल-जुल के सहें हिज्र की धूप
मुझ से तन्हा नहीं झेली जाती
बोलना मुझ से न तुम बंद करो
हर तरफ़ बात है फैली जाती
हम अगर अक़्ल को दरबाँ करते
हाथ से दिल की हवेली जाती
हाए संदल के दरख़्तों की ये राख
जान ख़ुशबू की न ले ली जाती
बन तो सकता था नया इक कमरा
अपने आँगन की चमेली जाती
प्यास जाती न अगर साहिल पर
क्यूँ समुंदर में अकेली जाती
चाँद झाँके जो किचन में 'परवीन'
मुझ से रोटी नहीं बेली जाती
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