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जब क्लास से टीचर जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
हम मिल कर शोर मचाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
हम मिल कर शोर मचाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
छुट्टी की इजाज़त मिलते ही हम जेल के इक क़ैदी की तरह
स्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जिस वक़्त पढ़ाते हैं टीचर दिल कितना परेशाँ होता है
लेकिन जब खेल खिलाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जब हम को किसी पिकनिक के लिए स्कूल की जानिब से अक्सर
उस्ताद कहीं ले जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
दर्जे में पढ़ाते वक़्त अक्सर जब मेरे सवालों पर यारो
उस्ताद भी चक्कर खाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
बाज़ार से जा कर मेरे लिए हर माह मिरे प्यारे पापा
बच्चों का रिसाला लाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
इन दर्सी किताबों में हम को कुछ लुत्फ़ नहीं मिलता लेकिन
जब 'कैफ़' की नज़्में गाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
Read Fullस्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जिस वक़्त पढ़ाते हैं टीचर दिल कितना परेशाँ होता है
लेकिन जब खेल खिलाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जब हम को किसी पिकनिक के लिए स्कूल की जानिब से अक्सर
उस्ताद कहीं ले जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
दर्जे में पढ़ाते वक़्त अक्सर जब मेरे सवालों पर यारो
उस्ताद भी चक्कर खाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
बाज़ार से जा कर मेरे लिए हर माह मिरे प्यारे पापा
बच्चों का रिसाला लाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
इन दर्सी किताबों में हम को कुछ लुत्फ़ नहीं मिलता लेकिन
जब 'कैफ़' की नज़्में गाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
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सोचता हूँ
वक़्त की गर्दन पकड़ कर
वक़्त की गर्दन पकड़ कर
रेशमी स्कार्फ़ का फंदा लगा कर
खींच लूँ
और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ
ज़मीं से
आसमाँ तक
सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे
वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए
सोचता हूँ
वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के
रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं
चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर
और थोड़ी देर
बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ
खेलने से भी जब अपना दिल न बहले
एक पत्थर पर पटख़ कर
हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ
सोचता हूँ
आसमाँ से छीन कर
जलते हुए सूरज की थाली
एक कश्ती की तरह
गहरे समुंदर में चलाऊँ
और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर
ग़र्क़ कर दूँ
सोचता हूँ
सोचते ही सोचते
मैं ख़ुद ही इक दिन
सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ
Read Fullखींच लूँ
और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ
ज़मीं से
आसमाँ तक
सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे
वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए
सोचता हूँ
वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के
रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं
चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर
और थोड़ी देर
बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ
खेलने से भी जब अपना दिल न बहले
एक पत्थर पर पटख़ कर
हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ
सोचता हूँ
आसमाँ से छीन कर
जलते हुए सूरज की थाली
एक कश्ती की तरह
गहरे समुंदर में चलाऊँ
और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर
ग़र्क़ कर दूँ
सोचता हूँ
सोचते ही सोचते
मैं ख़ुद ही इक दिन
सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ
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सब ज़बानों की जान है उर्दू
कितनी प्यारी ज़बान है उर्दू
कितनी प्यारी ज़बान है उर्दू
सारे अल्फ़ाज़ क़ीमती गौहर
जौहरी की दुकान है उर्दू
ये तराशे हुए हसीं जुमले
जैसे हीरों की कान है उर्दू
एक इक लफ़्ज़ मिस्ल-ए-शीर-ओ-शकर
कितनी मीठी ज़बान है उर्दू
सारी दुनिया में जिस की शोहरत है
फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्तान है उर्दू
ख़्वाह हिन्दू हो सिख हो या मुस्लिम
हर बशर की ज़बान है उर्दू
शहर-ए-दिल्ली का सिर्फ़ दिल ही नहीं
सारे भारत की जान है उर्दू
हैदराबाद-ओ-लखनऊ ही नहीं
हर जगह की ज़बान है उर्दू
कितनी सदियाँ गुज़र चुकीं लेकिन
आज तक नौजवान है उर्दू
'कैफ़' उर्दू के जो मुख़ालिफ़ हैं
उन के घर की ज़बान है उर्दू
Read Fullजौहरी की दुकान है उर्दू
ये तराशे हुए हसीं जुमले
जैसे हीरों की कान है उर्दू
एक इक लफ़्ज़ मिस्ल-ए-शीर-ओ-शकर
कितनी मीठी ज़बान है उर्दू
सारी दुनिया में जिस की शोहरत है
फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्तान है उर्दू
ख़्वाह हिन्दू हो सिख हो या मुस्लिम
हर बशर की ज़बान है उर्दू
शहर-ए-दिल्ली का सिर्फ़ दिल ही नहीं
सारे भारत की जान है उर्दू
हैदराबाद-ओ-लखनऊ ही नहीं
हर जगह की ज़बान है उर्दू
कितनी सदियाँ गुज़र चुकीं लेकिन
आज तक नौजवान है उर्दू
'कैफ़' उर्दू के जो मुख़ालिफ़ हैं
उन के घर की ज़बान है उर्दू
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कितनी मेहनत से पढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
हम को हर इल्म सिखाते हैं हमारे उस्ताद
हम को हर इल्म सिखाते हैं हमारे उस्ताद
तोड़ देते हैं जहालत के अँधेरों का तिलिस्म
इल्म की शम्अ'' जलाते हैं हमारे उस्ताद
मंज़िल-ए-इ'ल्म के हम लोग मुसाफ़िर हैं मगर
रास्ता हम को दिखाते हैं हमारे उस्ताद
ज़िंदगी नाम है काँटों के सफ़र का लेकिन
राह में फूल बिछाते हैं हमारे उस्ताद
दिल में हर लम्हा तरक़्क़ी की दुआ करते हैं
हम को आगे ही बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
सब को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सबक़ देते हैं
हम को इंसान बनाते हैं हमारे उस्ताद
हम को देते हैं ब-हर-लम्हा पयाम-ए-ता'लीम
अच्छी बातें ही बताते हैं हमारे उस्ताद
ख़ुद तो रहते हैं बहुत तंग-ओ-परेशान मगर
दौलत-ए-इल्म लुटाते हैं हमारे उस्ताद
हम पे लाज़िम है कि हम लोग करें उन का अदब
किस मोहब्बत से बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
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मंज़िल-ए-इ'ल्म के हम लोग मुसाफ़िर हैं मगर
रास्ता हम को दिखाते हैं हमारे उस्ताद
ज़िंदगी नाम है काँटों के सफ़र का लेकिन
राह में फूल बिछाते हैं हमारे उस्ताद
दिल में हर लम्हा तरक़्क़ी की दुआ करते हैं
हम को आगे ही बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
सब को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सबक़ देते हैं
हम को इंसान बनाते हैं हमारे उस्ताद
हम को देते हैं ब-हर-लम्हा पयाम-ए-ता'लीम
अच्छी बातें ही बताते हैं हमारे उस्ताद
ख़ुद तो रहते हैं बहुत तंग-ओ-परेशान मगर
दौलत-ए-इल्म लुटाते हैं हमारे उस्ताद
हम पे लाज़िम है कि हम लोग करें उन का अदब
किस मोहब्बत से बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
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हम आज कुछ हसीन सराबों में खो गए
आँखें खुलीं तो जागते ख़्वाबों में खो गए
आँखें खुलीं तो जागते ख़्वाबों में खो गए
हम सफ़्हा-ए-हयात से जब बे-निशाँ हुए
लफ़्ज़ों की रूह बन के किताबों में खो गए
आईना-ए-बहार के कुछ अक्स-ए-मुज़्महिल
ख़ुशबू का रंग पा के गुलाबों में खो गए
दर-अस्ल बर्शगाल के तुम आफ़्ताब थे
बरसात जब हुई तो सहाबों में खो गए
निकले थे जो भी आज तलाश-ए-सवाब में
वो ज़िंदगी के सख़्त अज़ाबों में खो गए
दिल को थी एक शहर-ए-तमन्ना की जुस्तुजू
लेकिन हम आरज़ू के ख़राबों में खो गए
जब मसअला हयात का कुछ हल न हो सका
हम 'कैफ़' फ़लसफ़े की किताबों में खो गए
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