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मिरी ज़िंदगी में बस इक किताब है इक चराग़ है
एक ख़्वाब है और तुम हो
एक ख़्वाब है और तुम हो
ये किताब ओ ख़्वाब के दरमियान जो मंज़िलें हैं मैं चाहता था
तुम्हारे साथ बसर करूँ
यही कुल असासा-ए-ज़िंदगी है इसी को ज़ाद-ए-सफ़र करूँ
किसी और सम्त नज़र करूँ तो मिरी दुआ में असर न हो
मिरे दिल के जादा-ए-ख़ुश-ख़बर पे ब-जुज़ तुम्हारे कभी किसी का गुज़र न हो
मगर इस तरह कि तुम्हें भी उस की ख़बर न हो
Read Fullतुम्हारे साथ बसर करूँ
यही कुल असासा-ए-ज़िंदगी है इसी को ज़ाद-ए-सफ़र करूँ
किसी और सम्त नज़र करूँ तो मिरी दुआ में असर न हो
मिरे दिल के जादा-ए-ख़ुश-ख़बर पे ब-जुज़ तुम्हारे कभी किसी का गुज़र न हो
मगर इस तरह कि तुम्हें भी उस की ख़बर न हो
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बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मिरा है
आँखें भी मिरी ख़्वाब-ए-परेशाँ भी मिरा है
आँखें भी मिरी ख़्वाब-ए-परेशाँ भी मिरा है
जो डूबती जाती है वो कश्ती भी है मेरी
जो टूटता जाता है वो पैमाँ भी मिरा है
जो हाथ उठे थे वो सभी हाथ थे मेरे
जो चाक हुआ है वो गिरेबाँ भी मिरा है
जिस की कोई आवाज़ न पहचान न मंज़िल
वो क़ाफ़िला-ए-बे-सर-ओ-सामाँ भी मिरा है
वीराना-ए-मक़तल पे हिजाब आया तो इस बार
ख़ुद चीख़ पड़ा मैं कि ये उनवाँ भी मिरा है
वारफ़्तगी-ए-सुब्ह-ए-बशारत को ख़बर क्या
अंदेशा-ए-सद-शाम-ए-ग़रीबाँ भी मिरा है
मैं वारिस-ए-गुल हूँ कि नहीं हूँ मगर ऐ जान
ख़मयाज़ा-ए-तौहीन-ए-बहाराँ भी मिरा है
मिट्टी की गवाही से बड़ी दिल की गवाही
यूँ हो तो ये ज़ंजीर ये ज़िंदाँ भी मिरा है
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अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
कि एक उम्र चले और घर नहीं आया
कि एक उम्र चले और घर नहीं आया
उस एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझीं आँखें
वो एक ख़्वाब कि अब तक नज़र नहीं आया
करें तो किस से करें ना-रसाइयों का गिला
सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया
दिलों की बात बदन की ज़बाँ से कह देते
ये चाहते थे मगर दिल इधर नहीं आया
अजीब ही था मिरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़
बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
हरीम-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी से निस्बतें भी रहीं
मगर सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया
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