चंद गज़ की शहरियत किस काम की
उड़ना आता है तो छत किस काम की
जब तुम्हें चेहरे बदलने का है शौक़
फिर तुम्हारी असलियत किस काम की
पूछने वाला नहीं कोई मिजाज़
इस क़दर भी ख़ैरियत किस काम की
हम भी कपड़ों को अगर तरजीह दें
फिर हमारी शख़्सियत किस काम की
ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं
हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं
मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से
ये जो लौंडे हैं मेरे पाँव दबाने लग जाए
बग़ैर उसको बताए निभाना पड़ता है
ये इश्क़ राज़ है इसको छुपाना पड़ता है
मैं अपने ज़हन की ज़िद से बहुत परेशाँ हूँ
तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है
तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है
ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है
इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाए
हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाए
इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब
सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाए
मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से
ये जो लौंडे हैं मेरे पाँव दबाने लग जाए
तेरी ख़ता नहीं जो तू ग़ुस्से में आ गया
पैसे का ज़ो'म था तेरे लहजे में आ गया
सिक्का उछालकर के तेरे पास क्या बचा
तेरा ग़ुरूर तो मेरे काँसे में आ गया
ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं
अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं
तूने तो औक़ात दिखा दी है अपनी
मैं अपना मेयार गिरा दूँ बिल्कुल नहीं
एक नजूमी सबको ख़्वाब दिखाता है
मैं भी अपना हाथ दिखा दूँ बिल्कुल नहीं
मेरे अंदर इक ख़ामोशी चीखती है
तो क्या मैं भी शोर मचा दूँ बिल्कुल नहीं
जगह की क़ैद नहीं थी कोई कहीं बैठे
जहाँ मक़ाम हमारा था हम वहीं बैठे
अमीर-ए-शहर के आने पे उठना पड़ता है
लिहाज़ा अगली सफ़ों में कभी नहीं बैठे