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बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है
ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है
ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है
मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ
तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है
तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है
ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ
हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ
हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ
इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब
सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ
चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही
हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ
हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो
ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ
ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे
जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ
मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से
ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
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ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं
अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं
अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं
तू ने तो औक़ात दिखा दी है अपनी
मैं अपना मेआ'र गिरा दूँ बिल्कुल नहीं
एक नजूमी सब को ख़्वाब दिखाता है
मैं भी अपना हाथ दिखा दूँ बिल्कुल नहीं
मेरे अंदर इक ख़ामोशी चीख़ती है
तो क्या मैं भी शोर मचा दूँ बिल्कुल नहीं
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