Allama Iqbal

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    सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
    अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

    तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ
    यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

    क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर
    चमन और भी आशियाँ और भी हैं

    अगर खो गया इक नशेमन तो क्या ग़म
    मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं

    तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
    तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

    इसी रोज़ ओ शब में उलझ कर न रह जा
    कि तेरे ज़मान ओ मकाँ और भी हैं

    गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में
    यहाँ अब मिरे राज़-दाँ और भी हैं

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    मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
    हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

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    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा

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    सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
    हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

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    लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
    ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी!
    दूर दुनिया का मिरे दम से अंधेरा हो जाए!
    हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!
    हो मिरे दम से यूंही मेरे वतन की ज़ीनत

    जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
    ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब
    इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब
    हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
    दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना
    मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को
    नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

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    दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
    पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

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    हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
    बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

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    तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
    तेरे सामने आसमाँ और भी हैं

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    माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
    तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

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    ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
    ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

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