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तुम्हारा दिल
तजल्लियों के तूर की ज़िया से
तजल्लियों के तूर की ज़िया से
आगही तलक
रियाज़तों के नूर में गुँधा हुआ
अमानतों के बार से दबा हुआ
तुम्हारी रूह के लतीफ़ आईने में
अपना अक्स ढूँडने
अक़ीदतों की गर्द से अटी हुई
अना के पुल-सिरात से गुज़र के आ रही हूँ मैं
Read Fullरियाज़तों के नूर में गुँधा हुआ
अमानतों के बार से दबा हुआ
तुम्हारी रूह के लतीफ़ आईने में
अपना अक्स ढूँडने
अक़ीदतों की गर्द से अटी हुई
अना के पुल-सिरात से गुज़र के आ रही हूँ मैं
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दिल जलाया तिरी ख़ुशी के लिए
या ख़ुद अपनी ही आगही के लिए
या ख़ुद अपनी ही आगही के लिए
हाथ पर रख के अपनी रूह-ए-तपाँ
हम चले अपनी रहबरी के लिए
नूर की महफ़िलों में रहते हैं
जो तरसते हैं रौशनी के लिए
कितने आलाम सह गए हम लोग
एक बे-नाम सी हँसी के लिए
आब-ए-हैवाँ भी गर मिले तो न लें
अपने मेआ'र-ए-तिश्नगी के लिए
फिर कोई क़हर हज़रत-ए-यज़्दाँ
कोई तहरीक बंदगी के लिए
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तुझ को अब कोई शिकायत तो नहीं
ये मगर तर्क-ए-मोहब्बत तो नहीं
ये मगर तर्क-ए-मोहब्बत तो नहीं
मेरी आँखों में उतरने वाले
डूब जाना तिरी आदत तो नहीं
तुझ से बेगाने का ग़म है वर्ना
मुझ को ख़ुद अपनी ज़रूरत तो नहीं
खुल के रो लूँ तो ज़रा जी सँभले
मुस्कुराना ही मसर्रत तो नहीं
तुझ से फ़रहाद का तेशा न उठा
इस जुनूँ पर मुझे हैरत तो नहीं
फिर से कह दे कि तिरी मंज़िल-ए-शौक़
मेरा दिल है मिरी सूरत तो नहीं
तेरी पहचान के लाखों अंदाज़
सर झुकाना ही इबादत तो नहीं
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काश तूफ़ाँ में सफ़ीने को उतारा होता
डूब जाता भी तो मौजों ने उभारा होता
डूब जाता भी तो मौजों ने उभारा होता
हम तो साहिल का तसव्वुर भी मिटा सकते थे
लब-ए-साहिल से जो हल्का सा इशारा होता
तुम ही वाक़िफ़ न थे आदाब-ए-जफ़ा से वर्ना
हम ने हर ज़ुल्म को हँस हँस के सहारा होता
ग़म तो ख़ैर अपना मुक़द्दर है सो इस का क्या ज़िक्र
ज़हर भी हम को ब-सद-शौक़ गवारा होता
बाग़बाँ तेरी इनायत का भरम क्यूँ खुलता
एक भी फूल जो गुलशन में हमारा होता
तुम पर असरार-ए-फ़ना राज़-ए-बक़ा खुल जाते
तुम ने एक बार तो यज़्दाँ को पुकारा होता
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