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जुनूँ में दामन-ए-दिल गरचे तार तार हुआ
मगर ये जश्न सर-ए-कूचा-ए-बहार हुआ
मगर ये जश्न सर-ए-कूचा-ए-बहार हुआ
हर एक सज्दे में दिल को तिरा ख़याल आया
ये इक गुनाह इबादत में बार बार हुआ
समेट ली हैं मोहब्बत ने सारी परवाज़ें
दिल-ओ-दिमाग़ में कैसा ये इंतिशार हुआ
नहीं बुझाया हवाओं ने पहली बार चराग़
ये सानेहा तो मिरे साथ बार बार हुआ
किसी के वास्ते तस्वीर-ए-इंतिज़ार थे हम
वो आ गया प कहाँ ख़त्म इंतिज़ार हुआ
अँधेरी शब के मुक़द्दर में इक सवेरा था
ये राज़ मुझ पे दम-ए-सुब्ह आश्कार हुआ
जो तुझ में डूब के देखा तो पा लिया ख़ुद को
'अलीना' यूँ मिरा फिर मुझ पे इख़्तियार हुआ
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बस नजात-ए-ज़िंदगी तो इश्क़-ए-रूहानी में है
ये सज़ा-ए-मौत सुन कर जिस्म हैरानी में है
ये सज़ा-ए-मौत सुन कर जिस्म हैरानी में है
रेत पर फैला हुआ है ख़्वाब जैसा इक सराब
ख़ुश्क आँखों का सुकूँ सहरा के इस पानी में है
इज़्तिराबी कैफ़ियत ही इस ज़मीं का है नसीब
हर घड़ी गर्दिश में है हर दम परेशानी में है
कुछ ग़ुबार आँखों तक आया राज़ हम पर तब खुला
क़ाफ़िला अब भी कोई इस दिल की वीरानी में है
फिर किसी तूफ़ान की आमद का अंदेशा हुआ
फिर क़यामत सी बपा दरिया की तुग़्यानी में है
यूँही आसानी से जीने का इरादा कर लिया
ये न देखा कितनी मुश्किल ऐसी आसानी में है
इस क़दर औराक़-ए-माज़ी पर चढ़ा गर्द-ओ-ग़ुबार
शायद अब इन की जगह बहते हुए पानी में है
अपनी मिट्टी से 'अलीना' रूह की उल्फ़त तो देख
मुज़्तरिब है ये बहुत गर तू परेशानी में है
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मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ
हर हसीं मंज़र बहुत जल्दी बदल जाता है क्यूँ
हर हसीं मंज़र बहुत जल्दी बदल जाता है क्यूँ
यूँ अंधेरे में दिखा कर रौशनी की इक झलक
मेरी मुट्ठी से हर इक जुगनू निकल जाता है क्यूँ
रौशनी का इक मुसाफ़िर थक के घर आता है जब
तो अँधेरा मेरे सूरज को निगल जाता है क्यूँ
तेरे लफ़्ज़ों की तपिश से क्यूँ सुलग उठती है जाँ
सर्द-मेहरी से भी तेरी दिल ये जल जाता है क्यूँ
अब के जब लौटेगा वो तो फ़ासला रक्खेंगे हम
ये इरादा उस के आते ही बदल जाता है क्यूँ
दूर है सूरज 'अलीना' फिर भी उस की धूप से
बर्फ़ की चादर में लिपटा तन पिघल जाता है क्यूँ
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जीत की और न हार की ज़िद है
दिल को शायद क़रार की ज़िद है
दिल को शायद क़रार की ज़िद है
कोई भी तो नहीं तआ'क़ुब में
जाने किस से फ़रार की ज़िद है
हम से कुछ कह रहे हैं सन्नाटे
पर हमें इंतिज़ार की ज़िद है
इश्क़ चाहे कि लब को जाम लिखे
हुस्न को इंकिसार की ज़िद है
बारहा हम ने संगसार किया
पर उसे ए'तिबार की ज़िद है
एक अंजाम-ए-तय-शुदा के लिए
फिर ख़िज़ाँ को बहार की ज़िद है
इक बार उस से क्या मिलीं नज़रें
दिल को अब बार बार की ज़िद है
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सारे मौसम बदल गए शायद
और हम भी सँभल गए शायद
और हम भी सँभल गए शायद
झील को कर के माहताब सुपुर्द
अक्स पा कर बहल गए शायद
एक ठहराव आ गया कैसा
ज़ाविए ही बदल गए शायद
अपनी लौ में तपा के हम ख़ुद को
मोम बन कर पिघल गए शायद
काँपती लौ क़रार पाने लगी
झोंके आ कर निकल गए शायद
हम हवा से बचा रहे थे जिन्हें
उन चराग़ों से जल गए शायद
अब के बरसात में भी दिल ख़ुश है
हिज्र के ख़ौफ़ टल गए शायद
साफ़ होने लगे सभी मंज़र
अश्क आँखों से ढल गए शायद
बारिश-ए-संग जैसे बारिश-ए-गुल
सारे पत्थर पिघल गए शायद
वो 'अलीना' बदल गया था बहुत
इस लिए हम सँभल गए शायद
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ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने
अपने होने की ख़बर सब से छुपा ली मैं ने
अपने होने की ख़बर सब से छुपा ली मैं ने
जब ज़मीं रेत की मानिंद सरकती पाई
आसमाँ थाम लिया जान बचा ली मैं ने
अपने सूरज की तमाज़त का भरम रखने को
नर्म छाँव में कड़ी धूप मिला ली मैं ने
मरहला कोई जुदाई का जो दरपेश हुआ
तो तबस्सुम की रिदा ग़म को ओढ़ा ली मैं ने
एक लम्हे को तिरी सम्त से उट्ठा बादल
और बारिश की सी उम्मीद लगा ली मैं ने
बा'द मुद्दत मुझे नींद आई बड़े चैन की नींद
ख़ाक जब ओढ़ ली जब ख़ाक बिछा ली मैं ने
जो 'अलीना' ने सर-ए-अर्श दुआ भेजी थी
उस की तासीर यहीं फ़र्श पे पा ली मैं ने
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