वो जिस की आँखों में रत-जगों की बसीरतें हैं
वो मिश'अल-ए-जाँ से दश्त की ज़ुल्मतों में
रस्ते बना रहा है
वो जिस के तन में हज़ारों मेख़ें गड़ी हुई हैं
कहाँ है शोरीदा-सर मुसाफ़िर
कि आज ख़ल्क़ उस को ढूँडती है
— Parveen Fana Syed
वो मिश'अल-ए-जाँ से दश्त की ज़ुल्मतों में
रस्ते बना रहा है
वो जिस के तन में हज़ारों मेख़ें गड़ी हुई हैं
कहाँ है शोरीदा-सर मुसाफ़िर
कि आज ख़ल्क़ उस को ढूँडती है
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