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हाँ यही सच है कि दिल मैं ने लगाया था कभी
आस्तीं में इक सँपोले को बसाया था कभी
आस्तीं में इक सँपोले को बसाया था कभी
वो जो रो रो के दिखाता है दिली ज़ख़्मों को अब
मैं ने उस से भी कई ज़ख़्मों को पाया था कभी
उस की गाली पे मुझे ग़म भी भला क्यूँ कर हो यूँ
उस ने इन क़दमों में सर भी तो झुकाया था कभी
टीस होती है उसे होने दो मुझ को क्या पड़ा
दर्द से मैं ने भी दिल अपना दबाया था कभी
जंग है उपमन्यु की जारी मगर ये ख़ुदस है
मुझ ज़ियाले को वो यूँ ज़िद पर जो लाया था कभी
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जाने क्यूँ लोग मेरा दर्द बढ़ा देते हैं
बातों बातों में तेरी याद दिला देते हैं
बातों बातों में तेरी याद दिला देते हैं
एक चिंगारी मेरे दिल में दबाए हूँ मैं
पस्त-फ़ितरत उसी को और हवा देते हैं
कोई शय है कि जिसे मैं ने भुलाया था मगर
वो उसी शै पे मेरा नाम लिखा देते हैं
इस मुहब्बत के बिना कैसे बचेगी दुनिया
क्यूँ वो इस जंग की दुनिया को सज़ा देते हैं
'नित्य' मतलब के लिए प्यार जताते थे जो
वक़्त पड़ने पे वही सच को भुला देते हैं
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जीते जी मर जाना कोई खेल नहीं
उन से इश्क़ लड़ाना कोई खेल नहीं
उन से इश्क़ लड़ाना कोई खेल नहीं
काँटों से हर-सू घिरकर यूँ दर्द सहे
गुल जैसा मुस्काना कोई खेल नहीं
मैं ने उन को पहले ही समझाया था
मेरा साथ निभाना कोई खेल नहीं
मैं पत्थर हूँ दिल भी मेरा पत्थर है
इस से सर टकराना कोई खेल नहीं
जिन की पूजा और इबादत देश हुआ
उन से प्रीत लगाना कोई खेल नहीं
'नित्य' विरह में जलकर सूरज के जैसा
शीतल चाँद सजाना कोई खेल नहीं
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