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“मुंतज़िर”
हम चाहते हैं यूँ जिन्हें उन की हमें
बस उम्र भर की ख़ैरियत की चाह है
जैसे कि सच वो लौट आएँगे कभी
दीदा-ओ-दिल इस तौर फ़र्श-ए-राह है
हम कब भला उन को नज़र में भर सके
थी देखने की ख़्वाह उन को जो रही
यूँ जो कभी मिलता हमारा रहगुज़र
थी चाह उन को देख लेते इक नज़र
कोई न थी उम्मीद पर जीते रहे
बस उम्र भर तस्वीर उन की देख कर
महरूम हम दाइम रहे उस लम्स से
हम से मुख़ातिब हो सके वो पल नहीं
हम ज़ुल्फ़ को उन की सँवारें भी कभी
मुद्दत हुई दिल में बस इक ये ख़्वाह है
हम चाहते हैं यूँ जिन्हें उन की हमें
बस उम्र भर की ख़ैरियत की चाह है
जैसे कि बस वो लौट आएँगे कभी
दीदा-ओ-दिल इस तौर फ़र्श-ए-राह है
Read Fullबस उम्र भर की ख़ैरियत की चाह है
जैसे कि सच वो लौट आएँगे कभी
दीदा-ओ-दिल इस तौर फ़र्श-ए-राह है
हम कब भला उन को नज़र में भर सके
थी देखने की ख़्वाह उन को जो रही
यूँ जो कभी मिलता हमारा रहगुज़र
थी चाह उन को देख लेते इक नज़र
कोई न थी उम्मीद पर जीते रहे
बस उम्र भर तस्वीर उन की देख कर
महरूम हम दाइम रहे उस लम्स से
हम से मुख़ातिब हो सके वो पल नहीं
हम ज़ुल्फ़ को उन की सँवारें भी कभी
मुद्दत हुई दिल में बस इक ये ख़्वाह है
हम चाहते हैं यूँ जिन्हें उन की हमें
बस उम्र भर की ख़ैरियत की चाह है
जैसे कि बस वो लौट आएँगे कभी
दीदा-ओ-दिल इस तौर फ़र्श-ए-राह है
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बे-असर ही रहे हर हकीमी शिफ़ा
इश्क़ वालों को है ये सुख़न ही शिफ़ा
इश्क़ वालों को है ये सुख़न ही शिफ़ा
उस के लफ़्ज़ों को मरहम समझते हैं हम
और उस के तबस्सुम को अपनी शिफ़ा
मरने वालों को बस इक तिरी चाह थी
तेरी मौजूदगी ही उन्हें थी शिफ़ा
जब कि तेरी कमी से था नासाज़ ज़ेहन
बिन तिरे किस तरह काम आती शिफ़ा
था पता होगा तुम बिन गुज़ारा नहीं
हम ने सो फिर नहीं आज़माई शिफ़ा
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