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एक-तरफ़ा इश्क़ का इज़हार करना चाहते हो
खु़द को शर्मिंदा सर-ए-बाजार करना चाहते हो
Read Fullखु़द को शर्मिंदा सर-ए-बाजार करना चाहते हो
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गिले शिकवे भुलाकर क्यूँ नहीं चलते
दिलों से दिल मिलाकर क्यूँ नहीं चलते
दिलों से दिल मिलाकर क्यूँ नहीं चलते
सियासत के बिछाए जाल हैं ये सब
ये मन में तुम बिठाकर क्यूँ नहीं चलते
पड़ा है जो तुम्हारी आँख पर यकसर
वही पर्दा हटाकर क्यूँ नहीं चलते
हुआ क्या है फ़क़त कुछ ख़्वाब टूटे हैं
नए सपने सजाकर क्यूँ नहीं चलते
अँधेरे में रखोगे ख़ुद को यूँ कब तक
कि लौ ख़ुद ही जलाकर क्यूँ नहीं चलते
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Rupesh Rahi
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वक़्त आने पे सब को बता जाएँगे
दिल में जितनी है उल्फ़त निभा जाएँगे
दिल में जितनी है उल्फ़त निभा जाएँगे
कोई पूछेगा जब होती है क्या वफ़ा
हम तिरंगे में सो कर दिखा जाएँगे
हम जिएँ या मरें इस का कुछ ग़म नहीं
मान अपने वतन का बढ़ा जाएँगे
राख होने से पहले ख़ुदा की क़सम
आग सीने में सबके लगा जाएँगे
जिन की ख़ुशबू रहेगी जहाँ में सदा
गुल चमन में हम ऐसे खिला जाएँगे
देख लेना किसी रोज़ शिद्दत से हम
हँसते-हँसते सभी को रुला जाएँगे
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