सुकूॅं अपना गॅंवाया है किसी ने
दरख़्तों को गिराया है किसी ने
परिंदे फिर रहे हैं मारे - मारे
किसी का घर जलाया है किसी ने
नहीं यूँॅं ही तुम्हें सींचा गया है
लहू अपना बहाएा है किसी ने
जहाँ शाबाशियों का घर था पहले
वहीं ख़ंजर चलाया है किसी ने
नहीं बाक़ी बचा अब हौसला है
बहुत पागल बनाया है किसी ने
— Rupesh Rahi















