बढ़ रहा आज क्यूँ अँधेरा है
जाने किस ने किया झमेला है
चार दिन ज़िंदगी बची देखो
उस
में कितने ग़मो का डेरा है
जब नहीं साथ कुछ चले तेरे
फिर भला नैन क्यूँ तरेरा है
सब यहीं का यहीं पड़ा होगा
साथ होगा न एक धेला है
नेक नामी ही संग जाएगी
और सब रैन का बसेरा है
रौशनी नेकियों की आज कमा
फिर भला वक़्त किस ने देखा है
‛नित्य' वो मिट गया ज़माने में
जिस ने दहशत का खेल खेला है
— Nityanand Vajpayee















