चराग़ों पे तोहमत लगाने चले हो
ज़माने को फिर वरग़लाने चले हो
अँधेरों की चादर में ख़ुद को लपेटे
लो सूरज को ही अब बुझाने चले हो
लुटेरे तुम्हीं हो ये सब जानते हैं
मगर मुझ पे उँगली उठाने चले हो
शिकायत हमें तुम से बिल्कुल नहीं है
जो करतब तुम्हारे छुपाने चले हो
तुम्हें रौशनी की किरण क्या थमा दी
मकाँ ही हमारा जलाने चले हो
पिघल कर के हथियार ही मैं बनूँगा
मुझे आग में जो तपाने चले हो
अजब 'नित्य' से आप कर के बग़ावत
यूँ लंका को सोना दिखाने चले हो
— Nityanand Vajpayee















