काजल शाम की आँख से ढलके आँचल तेरे शाने से
और ज़रा ग़म भी ले आएँ यादों के वीराने से
और ज़रा ग़म भी ले आएँ यादों के वीराने से
क्या उस ने सोचा होगा जब ख़त मेरा पहुँचा होगा
सोच रहा हूँ देख आऊँ मैं जा कर किसी बहाने से
चाहत के दो बदन शहर में अलग अलग क्यूँ रहते हैं
टकराने की हिम्मत भी थी जब बे-दर्द ज़माने से
सोने चाँदी की दीवारें ढह देना आसान न था
लेकिन तुम तो बहक गए इस दुनिया के बहकाने से
उजड़ गई जब प्यार की महफ़िल चले गए सब दिल वाले
तन्हा राहे बहल रहा है माज़ी के अफ़्साने से
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तुम्हारे पैकर से फूटने वाली रौशनी मेरी राह में है
ये फ़ासला इस लिए गवारा कि इक हक़ीक़त निगाह में है
ये फ़ासला इस लिए गवारा कि इक हक़ीक़त निगाह में है
फ़सील-ए-ग़म गिर गई तो किस से लिपट के रोएँगे शहर-ए-याराँ
ये सोच कर झूम उठा हूँ यारो कि ग़म ख़ुद अपनी पनाह में है
मैं ज़िंदगी तज के आ रहा हूँ इसी लिए मुस्कुरा रहा हूँ
ज़रा बताओ कि किस लिए अब कजी तुम्हारी कुलाह में है
तुम्हारे बाग़ों से दूर वीरान रेगज़ारों में गुल खिले हैं
शफ़क़ उफ़ुक़ के हिसार में है शगुफ़्तगी शाहराह में है
नदी नदी बे-कराँ ख़मोशी शजर शजर सोगवार साए
ये रात बीमार हो गई है कि मुब्तला फिर गुनाह में है
उदास यादों ने बाब-ए-अफ़्कार पर कई बार दस्तकें दीं
मगर क़लम है कि गुल-फ़िशाँ बिन्त-ए-शब की आराम-गाह में है
कोई क़लंदर है कोई दरवेश कोई वहशी है कोई 'राही'
हर एक शोरीदा-सर बराए-सहर तिरी ख़ानक़ाह में है
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अब तो ये सोच के भी दिल मिरा घबराता है
सुब्ह का भूला हुआ शाम को घर आता है
सुब्ह का भूला हुआ शाम को घर आता है
एक इक कर के बुझे जाते हैं रख़्शंदा नुजूम
एक तू है जो ब-हर-सम्त नज़र आता है
अब तिरा ख़्वाब भी इक पैकर-ए-सीमीं की तरह
आसमानों से मिरे दिल में उतर आता है
लज़्ज़त-ए-संग की ख़ातिर ही बयाबाँ से कोई
छोड़ कर बाग़ सर-ए-राह गुज़र आता है
दिल की दहलीज़ से जाता है जो इक मरमरीं जिस्म
हर तरफ़ घूम के बा-दीदा-ए-तर आता है
जिस्म थक कर भी नहीं राह में रुकता पल भर
दिल मगर उस के शबिस्ताँ में ठहर आता है
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इक अंजान राह पर दोनों
मिल गए आज बे-ख़तर दोनों
मिल गए आज बे-ख़तर दोनों
फूल है एक एक पत्थर है
बन गए कैसे हम-सफ़र दोनों
फ़ासले ऐसे कम नहीं होंगे
छोड़ दें अपना अपना घर दोनों
टक्करें ले रहे हैं दुनिया से
दिल में रखते नहीं हैं डर दोनों
ताड़ लेते हैं ताड़ने वाले
गो मिलाते नहीं नज़र दोनों
रात इक दूसरे में डूब गए
हो गए ख़ुद से बे-ख़बर दोनों
हो के गुमराह आज-कल 'राही'
फिर रहे हैं नगर नगर दोनों
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