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सुकूत-ए-लब को मिरे अर्ज़-ए-हाल ही समझो
मिरी अना-ए-ख़फ़ी को सवाल ही समझो
मिरी अना-ए-ख़फ़ी को सवाल ही समझो
वो रू-ब-रू हैं मिरे दिल मगर ये कहता है
ख़याल-ए-हुस्न को हुस्न-ए-ख़याल ही समझो
रफ़ाक़तों के क़रीने बदलते रहते हैं
सो कर्ब-ए-हिज्र को लुत्फ़-ए-विसाल ही समझो
तड़प रहे हैं जो यूँ हम सदा-ए-साज़ के साथ
उसे कुछ और नहीं वज्द-ओ-हाल ही समझो
मिरे हुनर को रहा बज़्म-ए-कम-नज़र से गुरेज़
उसे भी मेरे हुनर का कमाल ही समझो
हवा-ए-सुब्ह-ए-चमन और एक बार अगर
गुज़र गई तो हमें पाएमाल ही समझो
दिलों के ज़ख़्म छुपे हैं लहू की चादर में
तुम्हें ग़रज़ नहीं तुम इंदिमाल ही समझो
हुसूल-ए-कैफ़ को मय-ख़ाना-ए-हयात में 'लैस'
शिकस्त-ए-जाम से पहले मुहाल ही समझो
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तेरी जफ़ा हुई कि जहाँ का ग़ज़ब हुआ
हम पर तो जो सितम भी हुआ बे-सबब हुआ
हम पर तो जो सितम भी हुआ बे-सबब हुआ
इस साअ'त-ए-सईद को क्या नाम दीजिए
इंसाँ असीर-ए-वक़्त के ज़िंदाँ में जब हुआ
शोला-सिफ़त हैं रक़्स में अपने चमन के फूल
इस आलम-ए-बहार में ये क्या ग़ज़ब हुआ
शायद यही मज़ाक़-ए-तलब की है इंतिहा
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में भी दिल बे-तलब हुआ
मुंसिफ़ को मस्लहत की ज़बाँ रास आ गई
गो फ़ैसला हुआ मगर इंसाफ़ कब हुआ
उस को नसीब हो न सका रिश्ता-ए-ख़ुलूस
जो क़ाइल-ए-क़ज़िया-ए-हसब-ओ-नसब हुआ
जारी है एक तीरगी-ओ-रौशनी की जंग
जब से शुऊर-ए-सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब हुआ
हद-ए-निगाह तक कहीं शो'ले कहीं धुआँ
ये ख़ाक-ओ-ख़ूँ का खेल गुलिस्ताँ में कब हुआ
इस हादसे पे आप का जो तब्सिरा भी हो
मैं आश्ना-ए-महफ़िल-ए-ऐश-ओ-तरब हुआ
कैसे हो तुम को लज़्ज़त-ए-आज़ाद जाँ-नसीब
दुश्वार मरहलों से गुज़रना ही कब हुआ
कितने अज़ीम लोग तह-ए-ख़ाक हो गए
तू भी हुआ जो 'लैस' तो फिर क्या अजब हुआ
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दिल मुज़्महिल है तेरी नवाज़िश के बावजूद
ये सर
ये सर
ज़मीं उदास है बारिश के बावजूद
ख़ीरा न कर सके निगह-ए-इम्तियाज़ को
झूटे नगीं नुमूद-ओ-नुमाइश के बावजूद
एक फूल भी चमन में न दिल खोल कर हँसा
शबनम के आँसुओं की गुज़ारिश के बावजूद
क्या क़हर है कि झूट में मिलती है आफ़ियत
सच बोलना मुहाल है ख़्वाहिश के बावजूद
मेरा वक़ार ज़ीस्त न मजरूह कर सके
दुश्मन हज़ार हीला-ओ-साज़िश के बावजूद
अपनी ग़लत रविश को न तब्दील कर सके
कुछ दोस्त बार बार गुज़ारिश के बावजूद
बरख़ुद ग़लत कभी न हुए ज़िंदगी में 'लैस'
दुनिया-ए-फ़न में दाद-ओ-सताइश के बावजूद
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झूटे नगीं नुमूद-ओ-नुमाइश के बावजूद
एक फूल भी चमन में न दिल खोल कर हँसा
शबनम के आँसुओं की गुज़ारिश के बावजूद
क्या क़हर है कि झूट में मिलती है आफ़ियत
सच बोलना मुहाल है ख़्वाहिश के बावजूद
मेरा वक़ार ज़ीस्त न मजरूह कर सके
दुश्मन हज़ार हीला-ओ-साज़िश के बावजूद
अपनी ग़लत रविश को न तब्दील कर सके
कुछ दोस्त बार बार गुज़ारिश के बावजूद
बरख़ुद ग़लत कभी न हुए ज़िंदगी में 'लैस'
दुनिया-ए-फ़न में दाद-ओ-सताइश के बावजूद
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तुम ने भूले से कभी ये नहीं सोचा होगा
हम जो बिछड़ेंगे तो क्या हाल हमारा होगा
हम जो बिछड़ेंगे तो क्या हाल हमारा होगा
आ गए हो तो उजाला है मिरी दुनिया में
जाओगे तुम तो अँधेरा ही अँधेरा होगा
ये न कहिए कि मिरी आँख से टपका आँसू
छोड़िए भी कोई टूटा हुआ तारा होगा
क्या ख़बर थी की तिरे शहर से पहले ऐ दोस्त
रात आ जाएगी और राह में दरिया होगा
ख़्वाब लब ख़्वाब जबीं ख़्वाब अदा ख़्वाब हया
इतने ख़्वाबों में कोई ख़्वाब तो सच्चा होगा
दिल के आईने में कर अक्स-ए-तमन्ना न तलाश
तू मुक़ाबिल है तो हैरत के सिवा क्या होगा
पैकर-ए-इश्क़ तो फ़रहाद भी था मजनूँ भी
और वो शख़्स कि तू ने जिसे चाहा होगा
आज तो ख़ुश हूँ बहुत ख़ुश हूँ बहुत ही ख़ुश हूँ
इस तसव्वुर में मैं काँप उठता हूँ कल क्या होगा
एक वो हैं जिन्हें ख़ल्वत में भी लुत्फ़-ए-जल्वत
हाए वो शख़्स जो महफ़िल में भी तन्हा होगा
फ़िक्र अंजाम-ए-मोहब्बत की है तौहीन ऐ 'लैस'
वही होगा मिरी क़िस्मत में जो लिक्खा होगा
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