दिल के बुझे चराग़ जलाती चली गई
    क़दमों से सोए फ़ित्ने जगाती चली गई

    शो'ला था वो लपकता हुआ या कि बर्क़ थी
    रग रग में आग सी वो लगाती चली गई

    या जिस्म को वो ख़म कि कमाँ काम-देव की
    किस किस अदास तीर चलाती चली गई

    फूलों की डालियों की लचक बाज़ुओं में थी
    बल नाज़ुकी के बोझ से खाती चली गई

    नज़्म-ए-हसीं कहें कि उसे हम ग़ज़ल का शे'र
    अहल-ए-नज़र को वज्द में लाती चली गई

    एक जुम्बिश-ए-नज़र से लचकती कमर से वो
    क्या क्या फ़साने दिल के सुनाती चली गई

    रुख़ पर बिरह का रंग है या कि मिलन की आस
    दुनिया-ए-सोज़-ओ-साज़ दिखाती चली गई

    ख़्वाबों की बस्तियों में उड़ाए लिए फिरी
    यादों का एक शहर बसाती चली गई

    इस दौर-ए-मय-कशी में किसे होश था 'हबीब'
    कब आई और कब वो पिलाती चली गई
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    JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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    चमन में नाज़ से अठखेलियाँ करती बहार आई
    गुलों का पैरहन पहने वो जान-ए-इंतिज़ार आई

    चमन वाले सभी फ़र्त-ए-मसर्रत से पुकार उट्ठे
    बहार आई बहार आई बहार आई बहार आई

    कहीं कलियों को छेड़ा है कहीं फूलों को चूमा है
    गले मिल मिल के पत्तों से वो यूँ रूठी बहार आई

    नसीबा जाग उट्ठा फिर सभी अहल-ए-गुलिस्ताँ का
    दिलों का दाग़ धो धो कर वो बार-ए-ग़म उतार आई

    नई फिर ज़िंदगी आई नया दिल में सुरूर आया
    नए सपने नए अरमाँ नई आशा उभार आई

    खुला है मय-कदे का दर और इज़्न-ए-आम है सब को
    वहाँ पर आज रिंदों की क़तार अंदर क़तार आई

    गए गुलशन पे ग़ैरों के तो मौज-ए-रंग-ओ-बू बन कर
    हर इक गुलशन से हम को भी निदा-ए-ख़ुश-गवार आई

    निगाह-ए-बद से देखा है किसी ने गर गुलिस्ताँ को
    तो गुल-ची की हर इक साज़िश हमीं को साज़गार आई

    जिन्हों ने इस चमन को ख़ून और अश्कों से सींचा था
    बहार आई तो याद उन की हम को बार बार आई

    न माली हो कभी ग़ाफ़िल न अन-बन अहल-ए-गुलशन में
    तभी समझेंगे हम यारों हक़ीक़त में बहार आई

    सदा अपने चमन में दौर-दौरा हो बहारों का
    'हबीब' अपनी ज़बाँ पर ये दुआ बे-इख़्तियार आई
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    JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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    कहाँ गया वो ज़माना कि जिस की याद में आज
    भुलाए बैठा हूँ ख़ुद को पता नहीं मिलता

    गई कहाँ है वो अब सूरतें मोहब्बत की
    ज़माने भर में कहीं नक़्श-ए-पा नहीं मिलता

    मैं पूछूँ किस से पता और कहाँ कहाँ ढूँडूँ
    वहाँ का कोई भी आया गया नहीं मिलता
    वो अस्पताल की शब भी थी क्या क़यामत की
    वहाँ क़फ़स से जो ताइर उड़ा नहीं मिलता

    नहीफ़ बाज़ू थे मेरे लिए हिसार-ए-अमाँ
    मज़ा कहीं भी उस आग़ोश का नहीं मिलता

    वो बुझती आँखें थी मेरे लिए चराग़-ए-हयात
    निगाह-ए-मेहर का अब वो दिया नहीं मिलता

    तमीज़ कैसे करूँ रहज़न-ओ-रफ़ीक़ में अब
    रह-ए-हयात का वो रहनुमा नहीं मिलता

    बस एक दम से वो बदली हवा ज़माने की
    कि शैख़ मिलते हैं दिल बा-सफ़ा नहीं मिलता

    बला का शोर है उल्फ़त के मय-कदे में मगर
    शराब मिलती है लेकिन नशा नहीं मिलता

    हुई है रूह वो अब जज़्ब-ए-रूह-ए-पाक-ए-अज़ीम
    मिला जो ज़ात में उस की जुदा नहीं मिलता

    वो गोया अब्र का साया था ले उड़ी जो हवा
    बिखर के फूल का जैसे पता नहीं मिलता

    वो एक नग़्मा था गुम हो गया फ़ज़ाओं में
    कि जैसे बहर में क़तरा गिरा नहीं मिलता

    तलाश उन की यहाँ है 'हबीब' ला-हासिल
    कि चश्म-ए-तर से जो आँसू गिरा नहीं मिलता
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    बे-तअल्लुक़ ज़िंदगी भी ज़िंदगी होती है क्या
    साज़-ए-दिल ख़ामोश हो तो नग़्मगी होती है क्या

    यक-ब-यक तारीक दिल में क्यूँ उजाला हो गया
    याद-ए-यार-ए-मेहरबाँ से रौशनी होती है क्या

    देख कर तुझ को करेगा कोई क्यूँ सैर-ए-चमन
    गुल के चेहरे पर भी ऐसी ताज़गी होती है क्या

    जिस ने तेरे हुस्न की लौ देख ली समझा है वो
    क्यूँ चमकते हैं सितारे चाँदनी होती है क्या

    मस्त आँखों की क़सम क्यूँ रह गया हाथों में जाम
    मय-कदे में बिन-पिए भी मय-कशी होती है क्या

    वस्ल हो या हिज्र हो या इंतिज़ार-ए-यार हो
    दर्द-ए-दिल में हसरतों में कुछ कमी होती है क्या

    सादगी में दिलबरी है दिलबरी में सादगी
    कोई क्या समझे कि उन की सादगी होती है क्या

    याद तेरी आई है परदेस में कितनी 'हबीब'
    दूरी-ए-मंज़िल में कोई दिलकशी होती है क्या
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    चमन चमन से गुलों का यही पयाम आया
    वही हसीं है जो दुनिया में शाद-काम आया

    मिरी तरफ़ को उठी यूँ निगाह साक़ी की
    कि जैसे दौर में लबरेज़ मय का जाम आया

    ख़ुद उन के रुख़ से हुआ उन के दिल का हाल अयाँ
    जो भूले-बिसरे कभी लब पे मेरा नाम आया

    बढ़ा के हाथ ज़माने ने उस से छीन लिया
    जो एक लहजा भी लब तक किसी के जाम आया

    सदा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ थी ये बज़्म-ए-रिंदाँ में
    है इस का मै-कदा क़ब्ज़े में जिस के जाम आया

    हरीम-ए-नाज़ से आ तो गया हूँ मैं लेकिन
    पुकारता हुआ कोई हर एक गाम आया

    मैं गुम ही था अभी तारीकियों में माज़ी की
    कि सुब्ह-ए-नौ की किरन का मुझे सलाम आया

    ख़याल-ए-यार की मद-होशियाँ मआ'ज़-अल्लाह
    मिरी नज़र न उठी जब वो सू-ए-बाम आया

    ख़िरद की सारी गई पुख़्ता-कारियाँ बे-कार
    बस एक शौक़ का सौदा-ए-ख़ाम काम आया

    'हबीब' दाद-ए-सुख़न मिल गई मुझे उस रोज़
    पसंद-ए-तब्अ' जब उन को मिरा कलाम आया
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    फ़लक से हुए हैं ये पैहम इशारे
    ज़मीं से नहीं दूर ये चाँद तारे

    मुनव्वर हुई मेरी शाम-ए-ग़रीबाँ
    कि याद आ रहे हैं वतन के नज़ारे

    मिरी ज़िंदगी है कि है एक तूफ़ाँ
    ये बेचैन लहरें ये बेताब धारे

    तबीअ'त ने मेरी कभी भी न ढूँडे
    ये साहिल सफ़ीने वो साए सहारे

    उलझ सकता हूँ अब भी तूफ़ाँ से साथी
    ये क्यूँ मेरी कश्ती लगा दी किनारे

    ये हमवार-ओ-यकसाँ सी क्या ज़िंदगी है
    न आँधी न तूफ़ाँ न शो'ले शरारे

    कहीं छीन ले मुझ से पीरी न आ कर
    ये सीने की गर्मी नज़र के शरारे

    है बच्चों का इक खेल ये ज़िंदगी भी
    हसीं जो वो जीते हसीं वो जो हारे

    कभी प्यार कर के कभी प्यार पा कर
    जिए हम जहाँ में उसी के सहारे

    ये पत्ते हैं लर्ज़ां वो गुल दम-ब-ख़ुद
    बस इक हम न समझें ख़िज़ाँ के इशारे

    'हबीब' आप दुनियाँ को पहचानते हैं
    वो ये रंग बदले कि वो रूप धारे
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    दिल की कश्ती तेरे हवाले
    तेरे सिवा अब कौन सँभाले

    प्यार में पड़ गए जान के लाले
    आँख में आँसू पाँव में छाले

    कौन है तेरे दुख का साथी
    अपनी दुनिया आप बसा ले

    ख़ूँ होती है जिस की तमन्ना
    ऐसे भी हैं जीने वाले

    दुनियाँ जन्नत दुनियाँ दोज़ख़
    जैसे चाहे वैसा बना ले

    रात और दिन में क्या क्या देखा
    दिल में अँधेरे दिल में उजाले

    इस दुनिया का हासिल ये है
    प्यार किसी का दिल में बसा ले

    प्यार का ये दस्तूर नहीं है
    चुपके चुपके रोने वाले

    ख़ुद ही अपने पोंछ ले आँसू
    कौन 'हबीब' है आने वाले
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    वो जो बे-नियाज़-ए-जहाँ करे मुझे उस नज़र की तलाश है
    जो तुझे बना दे ग़म-आश्ना मुझे उस असर की तलाश है

    न रहे जहाँ पे पहुँच के फिर किसी दर पे जाने की आरज़ू
    जहाँ इश्क़ की भी है आबरू मुझे ऐसे दर की तलाश है

    जहाँ बिखरी प्यार की दास्ताँ जहाँ ज़र्रा ज़र्रा है आस्ताँ
    वो मिरी ज़मीं मिरा आसमाँ उसी रहगुज़र की तलाश है

    हैं तुझी से हुस्न की शोख़ियाँ हैं तुझी से इश्क़ की गर्मियाँ
    दिल-ए-ज़िंदा तेरी तलाश ही मिरी उम्र भर की तलाश है

    वो भी क्या मज़े की थी ज़िंदगी जो सफ़र सफ़र में गुज़र गई
    नहीं मंज़िलों में वो दिल-कशी मुझे फिर सफ़र की तलाश है

    जहाँ रक़्स में हो किरन किरन जहाँ ग़ुंचे चटकें चमन चमन
    नज़र आए जिस में वो सीम-तन मुझे उस सहर की तलाश है

    ये तबस्सुम उन का था लुट गया सर-ए-राह दिल का ये क़ाफ़िला
    वो जो बे-ख़बर सा चला गया उसी बे-ख़बर की तलाश है

    जहाँ दर्द-ओ-दाग़ की जुस्तुजू जहाँ नित नई नई आरज़ू
    कि जिसे तलाश-ए-सुकूँ नहीं मुझे उस जिगर की तलाश है
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    किसी दर पे जाने को जी चाहता है
    वफ़ा आज़माने को जी चाहता है

    उठाया था जिस बज़्म से हम को इक दिन
    वहीं फिर भी जाने को जी चाहता है

    हुए मुंदमिल ज़ख़्म-ए-दिल मेरे लेकिन
    नए ज़ख़्म खाने को जी चाहता है

    मआ'ल-ए-मोहब्बत समझता हूँ फिर भी
    कहीं दिल लगाने को जी चाहता है

    हैं कैसे मज़े के तिरे झूटे वा'दे
    कि फिर धोका खाने को जी चाहता है

    वो फिर आज कुछ हम से रूठे हुए हैं
    उन्हें फिर मनाने को जी चाहता है

    है मुद्दत से सूनी मिरे दिल की महफ़िल
    तुम्हीं से सजाने को जी चाहता है

    जो रौशन हैं महफ़िल में अक़्ल-ओ-ख़िरद से
    वो शमएँ बुझाने को जी चाहता है

    जो सोए हुए दिल में हलचल मचा दे
    वो तूफ़ाँ उठाने को जी चाहता है

    'हबीब' आग भर दें जो सीने में सब के
    वो नग़्में सुनाने को जी चाहता है
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    JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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