Idris Babar

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    उस की जानिब से भी चाहा है बराबर ख़ुद को
    मैंने इक-तरफ़ा मुहब्बत तो कभी की ही नहीं

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    सुना है मरते नहीं प्यार में अनारकली
    तो कैसा लगता है दीवार में अनारकली?

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    मेरी दुनिया में कोई चीज़ ठिकाने पे नहीं
    बस तुझे देख के लगता है कि सब अच्छा है

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    इस कदर मत उदास हो जैसे
    ये मोहब्बत का आख़िरी दिन है

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    वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा
    सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा

    ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है
    जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा

    पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद
    किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा

    ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त
    कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा

    ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और
    मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा

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    देखा नहीं चाँद ने पलट कर
    हम सो गए ख़्वाब से लिपट कर

    अब दिल में वो सब कहाँ है देखो
    बग़दाद कहानियों से हट कर

    शायद ये शजर वही हो जिस पर
    देखो तो ज़रा वरक़ उलट कर

    इक ख़ौफ़-ज़दा सा शख़्स घर तक
    पहुँचा कई रास्तों में बट कर

    काग़ज़ पे वो नज़्म खिल उठी है
    उग आया है फिर दरख़्त कट कर

    'बाबर' ये परिंद थक गए थे
    बैठे हैं जो ख़ाक पर सिमट कर

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    किसी के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाना आता है
    मिरे अज़ीज़ को हर इक बहाना आता है

    ज़रा सा मिल के दिखाओ कि ऐसे मिलते हैं
    बहुत पता है तुम्हें छोड़ जाना आता है

    सितारे देख के जलते हैं आँखें मलते हैं
    इक आदमी लिए शम-ए-फ़साना आता है

    अभी जज़ीरे पे हम तुम नए नए तो हैं दोस्त
    डरो नहीं मुझे सब कुछ बनाना आता है

    यहाँ चराग़ से आगे चराग़ जलता नहीं
    फ़क़त घराने के पीछे घराना आता है

    ये बात चलती है सीना-ब-सीना चलती है
    वो साथ आता है शाना-ब-शाना आता है

    गुलाब सिनेमा से पहले चाँद बाग़ के बा'द
    उतर पड़ूँगा जहाँ कारख़ाना आता है

    ये कह के उस ने सेमेस्टर ब्रेक कर डाला
    सुना था आप को लिखना लिखाना आता है

    ज़माने हो गए दरिया तो कह गया था मुझे
    बस एक मौज को कर के रवाना आता है

    छलक न जाए मिरा रंज मेरी आँखों से
    तुम्हें तो अपनी ख़ुशी को छुपाना आना है

    वो रोज़ भर के ख़लाई जहाज़ उड़ाते फिरें
    हमें भी रज के तमस्ख़ुर उड़ाना आता है

    पचास मील है ख़ुश्की से बहरिया-टाउन
    बस एक घंटे में अच्छा ज़माना आता है

    ब्रेक-डांस सिखाया है नाव ने दिल को
    हवा का गीत समुंदर को गाना आता है

    मुझे डीफ़ैंस की लिंगवा-फ़्रांका नईं आती
    तुम्हें तो सद्र का क़ौमी तराना आता है

    मुझे तो ख़ैर ज़मीं की ज़बाँ नहीं आती
    तुम्हें मिर्रीख़ का क़ौमी तराना आता है

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    दोस्त कुछ और भी हैं तेरे अलावा मिरे दोस्त
    कई सहरा मिरे हमदम कई दरिया मिरे दोस्त

    तू भी हो मैं भी हूँ इक जगह पे और वक़्त भी हो
    इतनी गुंजाइशें रखती नहीं दुनिया मिरे दोस्त!

    तेरी आँखों पे मिरा ख़्वाब-ए-सफ़र ख़त्म हुआ
    जैसे साहिल पे उतर जाए सफ़ीना मिरे दोस्त!

    ज़ीस्त बे-मा'नी वही बे-सर-ओ-सामानी वही
    फिर भी जब तक है तिरी धूप का साया मिरे दोस्त!

    अब तो लगता है जुदाई का सबब कुछ भी न था
    आदमी भूल भी सकता है न रस्ता मिरे दोस्त!

    राह तकते हैं कहीं दूर कई सुस्त चराग़
    और हवा तेज़ हुई जाती है अच्छा मिरे दोस्त!

    Idris Babar
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    एक दिन ख़्वाब-नगर जाना है
    और यूँही ख़ाक-बसर जाना है

    उम्र भर की ये जो है बे-ख़्वाबी
    ये उसी ख़्वाब का हर्जाना है

    घर से किस वक़्त चले थे हम लोग
    ख़ैर अब कौन सा घर जाना है

    मौत की पहली अलामत साहिब
    यही एहसास का मर जाना है

    किसी तक़रीब-ए-जुदाई के बग़ैर
    ठीक है जाओ अगर जाना है

    शोर की धूल में गुम गलियों से
    दिल को चुप-चाप गुज़र जाना है

    Idris Babar
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    टेंशन से मरेगा न कोरोने से मरेगा
    इक शख़्स तेरे साथ न होने से मरेगा

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