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मैं तो इक वजूद-ए-ख़याल हूँ
मुझे जिस तरह से भी सोच लो
मुझे जिस तरह से भी सोच लो
मैं यक़ीं भी हूँ मैं गुमाँ भी हूँ
मैं यहाँ भी हूँ मैं वहाँ भी हूँ
कभी फ़िक्र में कभी ज़िक्र में
कभी जोश में कभी होश में
कभी ख़ुद से ख़ुद की तलाश में
कभी मैं नहीं कभी जाँ नहीं
कि मैं मुब्तला-ए-जुनून हूँ
मैं ख़ुदी में ख़ुद का सुकून हूँ
यही इश्क़ है मिरा कारवाँ
मैं किधर नहीं मैं कहाँ नहीं
मिरा यार मुझ में मैं यार में
मैं हूँ बे-ख़ुदी के ख़ुमार में
मिरा यार मुझ में है रक़्स-ज़न
मैं रवाँ रवाँ भी रवाँ नहीं
मिरी राहतों में तू जल्वा-गर
मिरी वहशतों का तू हम-सफ़र
मिरा हिज्र तू मिरा वस्ल तू
मिरे घर का एक पता है बस
जहाँ तू नहीं मैं वहाँ नहीं
Read Fullमैं यहाँ भी हूँ मैं वहाँ भी हूँ
कभी फ़िक्र में कभी ज़िक्र में
कभी जोश में कभी होश में
कभी ख़ुद से ख़ुद की तलाश में
कभी मैं नहीं कभी जाँ नहीं
कि मैं मुब्तला-ए-जुनून हूँ
मैं ख़ुदी में ख़ुद का सुकून हूँ
यही इश्क़ है मिरा कारवाँ
मैं किधर नहीं मैं कहाँ नहीं
मिरा यार मुझ में मैं यार में
मैं हूँ बे-ख़ुदी के ख़ुमार में
मिरा यार मुझ में है रक़्स-ज़न
मैं रवाँ रवाँ भी रवाँ नहीं
मिरी राहतों में तू जल्वा-गर
मिरी वहशतों का तू हम-सफ़र
मिरा हिज्र तू मिरा वस्ल तू
मिरे घर का एक पता है बस
जहाँ तू नहीं मैं वहाँ नहीं
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तिरा ख़याल मुझे इस तरह पुकारता है
कि मंदिरों में कोई आरती उतारता है
कि मंदिरों में कोई आरती उतारता है
हिलोरें लेती है कुछ इस तरह तिरी यादें
नदी में जैसे कोई कश्तियाँ उतारता है
ख़मोशियों के बिछौने पे शब के पिछले पहर
तिरा ख़याल नई आरज़ू उभारता है
तिरी वफ़ाओं के मौसम बदलते रहते हैं
मिरी वफ़ा का चमन बस तुझे निहारता है
कुछ आहटें सी कहीं हो रही हैं दिल के क़रीब
कोई तो है जो मिरी बज़्म-ए-जाँ सँवारता है
मुझे तो अपने अक़ीदों की पुख़्तगी है अज़ीज़
नहीं ये ख़ौफ़ कोई सर मिरा उतारता है
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मिरा वजूद मिरे ए'तिबार जैसा है
कभी विसाल कभी इंतिज़ार जैसा है
कभी विसाल कभी इंतिज़ार जैसा है
मुझे तो उस की मसीहाई पर था नाज़ बहुत
मगर वो ख़ुद ही बड़ा बे-क़रार जैसा है
मिरे ज़मीर पे है बोझ मेरे माज़ी का
जो मेरी ज़ात पे अब तक उधार जैसा है
अजीब एक मुअ'म्मा है इश्क़ भी 'जगदीश'
कभी ये जीत कभी सिर्फ़ हार जैसा है
यहाँ न कोई इरादा न आरज़ूएँ हैं
मिरा जुनूँ मिरे दिल के ग़ुबार जैसा है
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इक पुरानी शराब जैसा इश्क़
मुझ से ख़ाना-ख़राब जैसा इश्क़
मुझ से ख़ाना-ख़राब जैसा इश्क़
'मीर' की एक ग़ज़ल सा दिल-अफ़रोज़
इक मुक़द्दस किताब जैसा इश्क़
है गुनह भी यही इबादत भी
आक़िबत के हिसाब जैसा इश्क़
कभी सहरा कभी समुंदर है
कभी गंगा के आब जैसा इश्क़
सौ दु'आओं का मुस्तक़िल एहसास
बंदगी के सवाब जैसा इश्क़
आब-ए-ज़म-ज़म है इस को पी लीजे
है मुक़द्दस शराब जैसा इश्क़
मुख़्तसर बहर की है मेरी ग़ज़ल
इस ग़ज़ल के जवाब जैसा इश्क़
किसी मा'शूक़ के बदन की महक
एक ताज़ा गुलाब जैसा इश्क़
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