मैं ने साँसों से गुफ़्तुगू की है
साथ चलने की आरज़ू की है
गुम-शुदा वक़्त के मुसाफ़िर को
फिर से पाने की जुस्तुजू की है
ज़ंग-ख़ुर्दा हयात का क्या ज़िक्र
बात लम्हों की आबरू की है
ख़ुद में ख़ुद को तलाश करने की
मैं ने कोशिश चहार-सू की है
— Jagdish Prakash
साथ चलने की आरज़ू की है
गुम-शुदा वक़्त के मुसाफ़िर को
फिर से पाने की जुस्तुजू की है
ज़ंग-ख़ुर्दा हयात का क्या ज़िक्र
बात लम्हों की आबरू की है
ख़ुद में ख़ुद को तलाश करने की
मैं ने कोशिश चहार-सू की है
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