तुम्हारा ज़िक्र मिरी दास्तान बन बैठा

मैं एक ज़र्रा था और आसमान बन बैठा

सवाल करते हैं रह-रह के मुझ से लैल-ओ-नहार
मैं अपनी ज़ात से क्यूँ बद-गुमान बन बैठा

वो जिस ने मुझ को नज़र भर के भी नहीं देखा
वो शख़्स मेरे फ़साने की जान बन बैठा

ख़याल-ए-नौ से उलझता हुआ मिरा एहसास
मिरी ग़ज़ल के सफ़र का बयान बन बैठा

मैं जिस्म हूँ कि कोई रूह या फ़क़त एहसास
मिरा वजूद ख़ुद इक इम्तिहान बन बैठा

कभी जो उस को तसव्वुर में ला के देख लिया
हर इक ख़याल मिरा गुल्सितान बन बैठा

— Jagdish Prakash

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