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सपने गए सुकून भी उल्फ़त चली गई
मिलने की अपने आप से फ़ुर्सत चली गई
मिलने की अपने आप से फ़ुर्सत चली गई
मेरी तो बोलने की ही आदत चली गई
तेरे ही साथ सारी शरारत चली गई
खुशियांँ थीं उस से घर में थीं आंँगन में रौनकें
बिटिया के साथ घर की भी बरकत चली गई
छूटा तुम्हारा साथ तो बाक़ी ही क्या बचा
दिल में जो पल रही थी वो हसरत चली गई
आते नहीं फ़क़ीर न साइल भी आजकल
माँ क्या गई कि घर की रिवायत चली गई
मेरे सुख़न पे तू ने उठाईं जो उँगलियाँ
मेरी तमाम उम्र की मेहनत चली गई
यूँंँ भी कभी जहान में इफ़रात में न थी
थोड़ी बहुत थी वो भी सदाक़त चली गई
होती नहीं है शे'र की आमद भी अब नज़र
तुम क्या गए कि लफ़्ज़ की ताक़त चली गई
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कोई अपना तो नहीं जो वो पराया होगा
आते जाते ही कोई हाथ मिलाया होगा
आते जाते ही कोई हाथ मिलाया होगा
बात करता है सलीक़े से अदब से सब से
ये असासा वो विरासत में ही पाया होगा
एक मुद्दत से भरम ले के जिए जाता हूँ
उस की आँखों में कोई मुझ सा समाया होगा
उस की आँखों में सुकूँ दिल में तसल्ली होगी
फ़र्ज़ थोड़ा भी अगर उस ने निभाया होगा
सिर्फ़ मलबा ही निशानी था हमारे घर की
अब की बारिश ने तो उस को भी बहाएा होगा
ग़ैर मक़सद वो मिले उस की तो फ़ितरत ही नहीं
सिर्फ़ रस्मन ही गले उस ने लगाया होगा
इतनी रौनक़ तो फ़िज़ाओं में नहीं थी अब तक
उस ने नग़्मा ही कोई आज सुनाया होगा
यूँ तो होती ही नहीं सब को बुलंदी हासिल
जाने कितनों को ज़माने में सताया होगा
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हम को दुश्मन से नहीं ग़द्दार से शिकवा बहुत
बन के दुश्मन जो मिला उस यार से शिकवा बहुत
बन के दुश्मन जो मिला उस यार से शिकवा बहुत
परवरिश में क्या कमी हम से हुई ये सोच कर
घर के बच्चों से मिले व्यवहार से शिकवा बहुत
इस को सच लिखना था लेकिन जाने इस को क्या हुआ
हो गई थोथी क़लम की धार से शिकवा बहुत
कोशिशें मैं ने हज़ारों कीं मनाने के लिए
जो रही बेकार उस मनुहार से शिकवा बहुत
बेच कर सपने ज़माने में लिए कितने ही ग़म
इतने घाटे के लिए व्यापार से शिकवा बहुत
ज़िन्दगी ने जो लिखी चुप-चाप मैं पढ़ता गया
उस कहानी में मिले किरदार से शिकवा बहुत
साथ रह कर भी जो अपनी फ़ितरतों पर थे बज़िद
मुझ को फूलों से शिकायत ख़ार से शिकवा बहुत
जिस पे कर विश्वास वो लहरों में जा कूदी "नज़र"
डूबते देखा उसे पतवार से शिकवा बहुत
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एक खिड़की थी दिखी मुझ को खुली शाम के बा'द
याद आई थी क़सम कल भी तेरी शाम के बा'द
याद आई थी क़सम कल भी तेरी शाम के बा'द
शे'र आया ही नहीं कोई ज़बांँ पर मेरा
सिर्फ़ तेरी ही ग़ज़ल मैं ने पढ़ी शाम के बा'द
याद आई थी अचानक ही मुझे बच्चों की
एक चिड़िया जो कहीं छत पे गिरी शाम के बा'द
जाने कितने ही मनाज़िर थे मेरी नज़रों में
बा'द मुद्दत जो तेरी बात चली शाम के बा'द
याद आया था मुझे फिर से किसी का वा'दा
नींद आँखों की मेरी फिर से उड़ी शाम के बा'द
सूखे ज़ख़्मों के निशानों से लहू टपका फिर
टीस सीने में कोई फिर से उठी शाम के बा'द
रोज़ी रोटी की मशक़्क़त में मेरा दिन गुज़रा
प्यास आँखों की किताबों से बुझी शाम के बा'द
जो सुनाती थी सदाक़त की कहानी दिनभर
उस हवेली से कोई चीख़ उठी शाम के बा'द
फिर वही दर्द वही अश्क वही तन्हाई
दिल से निकली थी कोई आह दबी शाम के बा'द
लौट आई थीं सताने का इरादा कर के
फिर से यादों से मेरी जंग छिड़ी शाम के बा'द
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कह तो सकते थे वही लोग ख़ुदा है मुझ
में
में
जो ये कहते हैं कि शैतान छुपा है मुझ में
डाँट देता है गुनाहों पे हमेशा मुझ को
तब ये लगता है कोई मुझ से बड़ा है मुझ में
मेरी आँखों में अँधेरा ही नज़र आता है
यूँ तो लाखों ही चराग़ों की ज़िया है मुझ में
बढ़ते जाते हैं ये दुश्मन की तरह ग़म मेरे
तुम तो कहते थे कि हर ग़म की दवा है मुझ में
दोस्त लगता है कभी और कभी दुश्मन सा
ऐसा लगता है कोई मेरे सिवा है मुझ में
हाथ जब भी हैं बढ़े मेरे गुनाहों की तरफ़
क़त्ल अपना ही कोई ख़ुद ही किया है मुझ में
मेरे अंदर की कोई आ के इबारत पढ़ ले
सारी दुनिया का 'नज़र' दर्द लिखा है मुझ में
Read Fullडाँट देता है गुनाहों पे हमेशा मुझ को
तब ये लगता है कोई मुझ से बड़ा है मुझ में
मेरी आँखों में अँधेरा ही नज़र आता है
यूँ तो लाखों ही चराग़ों की ज़िया है मुझ में
बढ़ते जाते हैं ये दुश्मन की तरह ग़म मेरे
तुम तो कहते थे कि हर ग़म की दवा है मुझ में
दोस्त लगता है कभी और कभी दुश्मन सा
ऐसा लगता है कोई मेरे सिवा है मुझ में
हाथ जब भी हैं बढ़े मेरे गुनाहों की तरफ़
क़त्ल अपना ही कोई ख़ुद ही किया है मुझ में
मेरे अंदर की कोई आ के इबारत पढ़ ले
सारी दुनिया का 'नज़र' दर्द लिखा है मुझ में
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