उस के मन के भीतर क्या क्या नहीं हुआ
वो फूल जो किसी तितली का नहीं हुआ
वो फूल जो किसी तितली का नहीं हुआ
इश्क़ में बँटता नहीं बराबर से कुछ भी
मैं ज़ाया' हो गया वो तन्हा नहीं हुआ
उस ने तो तीसरी मोहब्बत भी कर ली
मुझ से घर के बाहर जाना नहीं हुआ
टूट गया था अंदर तक पर कुछ न कहा
वो ख़ुश थी बात का तमाशा नहीं हुआ
मेरा नाम बदल कर बला रखा जाए
मेरे साथ किसी का अच्छा नहीं हुआ
मली गई थी कालिख कुछ इस तरह कि फिर
अंदर तक में कभी उजाला नहीं हुआ
इत्र लगा कर आई थी ख़ुद-कुशी मगर
मैं उस ख़ुशबू का दीवाना नहीं हुआ
मेरे गिरने पर हँसने वाले लोगों
मेरे मरने पर कुछ हूँ हा नहीं हुआ
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सभी के दिलों से निकाला हुआ
कहाँ जाएगा यार हारा हुआ
कहाँ जाएगा यार हारा हुआ
अगर जाएगा अब पुकारा मुझे
नहीं आएगा अब पुकारा हुआ
सवालात कर के मेरे इश्क़ पर
वफ़ा की हया का तमाशा हुआ
मोहब्बत वफ़ा या वो इकरार ही
नहीं याद क्या जान-ए-जाँ क्या हुआ
सभी का रहा मैं बड़ा ही अज़ीज़
सभी का मुझी से किनारा हुआ
हमारा हमारा हमारा ये दिल
तुम्हारा तुम्हारा तुम्हारा हुआ
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एक तो सब हम से बरहम हैं
ऊपर से फिर ग़म ही ग़म हैं
ऊपर से फिर ग़म ही ग़म हैं
किस पर चीखें चिल्लाएँ हम
अब तो केवल हम ही हम हैं
ओ क़हक़हा लगाने वालों
दर्द ठहाकों के हर दम हैं
बाहर इक दो जाम बचे हैं
अंदर अब भी सौ सौ ग़म हैं
नक़ली फूलों पर भी देखो
जमी हुई ढेरों शबनम हैं
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मर कर ही अब उस के दिल में उतरा जा सकता है
तीर नुकीला न हो तो कितना गहरा जा सकता है
तीर नुकीला न हो तो कितना गहरा जा सकता है
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