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Deep kamal panecha

Top 10 of Deep kamal panecha

Deep kamal panecha

Top 10 of Deep kamal panecha

    नींद से क्यूँ मिरी दुश्मनी हो गई
    ऐसी कैसी मुझे दिल-लगी हो गई

    इस तरह ख़ुद को उस
    में मिला बैठा मैं
    पूरी दुनिया ही ये अजनबी हो गई

    सारी दुनिया से किस तर्ज़ पर मैं लड़ूँ
    उस के ही साथ में जब कमी हो गई

    है मिरी नींदों का बस उसी से वुजूद
    उस के बिन ये भी नाराज़ सी हो गई

    मैं ने आँखें डुबों दी गले माँ से लग
    माँ की आँखों में भी फिर नमी हो गई

    मैं ने तो गुफ़्तगू उस से यूँ ही की थी
    जाने कब वो मिरी ज़िन्दगी हो गई

    उस के आगे मैं सर भी झुका लेता हूँ
    रब की मानों यहीं बंदगी हो गई

    हाँ लिया देख सब कुछ दुबारा मैं ने
    उस की सब ग़ज़लों में हाज़िरी हो गई

    इतना कस के लगा उस के सीने से मैं
    उस की, अंदर मिरे ख़ुशबू सी हो गई
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    Deep kamal panecha
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    "मेरी ज़िंदगी तेरे नाम"
    रेज़ा रेज़ा मुझे अपनी साँसें फ़क़त तेरे हवाले करनी है
    तू जहाँ अपना पैर रखे वहाँ मुझे अपनी जबीं धरनी है
    तेरे बाहें मेरे गले का हार हो, तेरी ख़ुश्बू लिखने के अश'आर हो
    ऐसे ही मैं जान-ए-ज़िगर जीता रहूँ ऐसे ही ज़िन्दगी पार हो

    एक बाग़ सी हसीन होगी अपनी दुनिया
    उस
    में तेरे मेरे माँ-पापा बरगद के पेड़ जैसे
    सब से बूढ़े सब से उम्र-दराज़ और अनुभव
    उन के इन्हीं गुण होंगे जैसे उन की शाख़ें
    ये शाख़ें पूरे के पूरे बाग़ को छाँव देगी
    बाग़ में अपने जज़्बातों के छोटे फूल होंगे
    चंद कलियाँ मनचली की होगी जानाँ
    तो कुछ कलियाँ दिलबरी की होगी
    एक एक फूल अपने जज़्बात से खिलेगा
    इतना ज़ियादा इश्क़ तुझे कहाँ मिलेगा
    मैं चाहता हूँ अपने मरने के बा'द भी आबाद रहें
    ऐसी दास्ताँ हो अपनी कि सब को ज़बानी याद रहें

    तेरे जिस्म की हर लकीर को मैं पढूँ
    और तू इस पर शान से नाज़ उठाए
    सुब्ह तू आइने के सामने खड़ी हो कर
    मेरे आगे हाथ में सिंदूर, सूनी माँग लाए
    मैं अपने हाथों से तेरी माँग भरूँ
    और तू इतनी ख़ूब-सूरत लगेगी
    तुझे देख के जहाँ की हर लड़की
    सुहागन बनने की दुआ करेगी

    रोज़ शाम को मैं तेरा दामन ओढ़ कर सो जाऊँ
    ख़ुदा भी तुझ से रश्क करें इतना तेरा हो जाऊँ
    मेरी सारी बे-चैनियाँ तुझ से लिपट के सुकूँ हो जाएगी
    तेरी सारी परेशानियाँ मैं अपने सर पर तार लूँगा
    तू अव्वल तेरा हर दाव, ख़ुशी हर चीज़ मेरे लिए अव्वल
    तेरी परेशानियों संग मैं अपनी ज़िंदगी हँसते गुज़ार लूँगा
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    Deep kamal panecha
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    ये सर्दी के मौसम की बारिश
    मिरी ही है शायद गुज़ारिश

    न आए कहीं चैन मुझ को
    सो बरसात ने की है साज़िश

    रहे तू सदा साथ मेरे
    ये मेरी ग़ज़ल की है ख़्वाहिश

    कमर पे दिया तिल ख़ुदा ने
    तिरे हुस्न की, की नुमाइश

    खफ़ा करती कह के मुझे झूट
    जुदा करने की करती साज़िश

    ये क्यूँ करते हो पूछा मैं ने
    कहें आदतों की है वर्ज़िश

    मुझे रहना है उस के दिल में
    लगातार करता हूँ कोशिश

    यक़ीं कैसे ख़ुद पे दिलाऊँ
    वो तोड़े ज़रा अपनी बंदिश

    वो इक बार अपना कहें बस
    करूँगा उमर भर परस्तिश

    ज़रा देख इस
    में उतर के
    मुहब्बत बड़ी प्यारी लग़्ज़िश

    नहीं बात की आज उस से
    है कुछ "दीप" के दिल में रंज़िश
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    Deep kamal panecha
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    बारिश ये इतनी हँस रही है तो सही
    हर एक बादल में नमी है तो सही

    आलम ये मेरी आरज़ू ही तो है एक
    ये आरज़ू मेरी सजी है तो सही

    बेचैन बैठा हूँ मैं इस तन्हाई में
    इस
    में तुम्हारी इक कमी है तो सही

    अच्छा मुहब्बत आह इक बीमारी हैं
    बीमारी ये मुझ को लगी है तो सही

    क्या, "दीप" को वहशी कहा है तुम ने ही
    बुद्धि तुम्हारी ये सही है तो सही
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    Deep kamal panecha
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    टूट-फूट कर हर दम अब बिखर चुका हूँ मैं
    हर सितम जहान-ए-ग़म से गुजर चुका हूँ मैं

    है नहीं मेरे ख़्वाबों में ख़याल अब तेरा
    क्या गिला किसी से आहिस्ता मर चुका हूँ मैं

    सोच में हो तुम हर दम मेरे या'नी सब कुछ हो
    वाकई तो कैसे तुम से उतर चुका हूँ मैं

    रूह ख़्वाब साँसे धड़कन ख़याल सब मेरे
    सिर्फ़ नाम पे तेरे जानाँ धर चुका हूँ मैं

    मुझ को मुहब्बत में चाहते हो करना ख़त्म
    पहले भी जाँ इस रस्ते से गुज़र चुका हूँ मैं

    पास मत रहो चाहे दूर भी चले जाओ
    पर तुम्हें तो अपनी पलकों में भर चुका हूँ मैं

    बस नहीं मेरा नफरत करना चाहूँ गर तुम से
    ख़ुद को इश्क़ में पागल इतना कर चुका हूँ मैं

    चलना ही पड़ेगा अब उस के गाँव की ज़ानिब
    मौत के लिए ख़ुद ही जो सँवर चुका हूँ मैं

    ज़िन्दगी में काफी है बस सुख़न-वरी मुझ को
    बाक़ी सारी इस दुनिया से मुकर चुका हूँ मैं

    दोस्त उम्र भर पछताना मुझे पड़ेगा ही
    दीप को जुदा ख़ुदस कर अगर चुका हूँ मैं
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    Deep kamal panecha
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    कहीं मैं जा के नदी में डुबा दूँ क्या ख़ुद को
    या फिर मैं आग की लौ में जला दूँ क्या ख़ुद को

    सताओ मत मुझे इतना भी ऐ मिरे अपनों
    मैं जंग में कहीं जा के कटा दूँ क्या ख़ुद को

    मैं पूछता हूँ ये थक हार के तुम्हें जानाँ
    मैं मेरी मौत से सीने लगा दूँ क्या ख़ुद को

    करार-ए-दिल न कभी साथ होगा तू मेरे
    तो साँस लेने से भी अब थका दूँ क्या ख़ुद को

    हाँ चुभता है मुझे महबूब का बुरा लहजा
    सो बुझती लौ की तरह मैं बुझा दूँ क्या ख़ुद को

    ये ज़िन्दगी तो मुहब्बत ही है मुहब्बत बस
    मोहब्बतों से भी अब क्या छुपा दूँ क्या ख़ुद को

    उसी ने की है यहाँ बे-वफ़ाई उल्फ़त में
    तो उस के नाम पे मैं अब मिटा दूँ क्या ख़ुद को
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    Deep kamal panecha
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    शब-ए-फ़िराक़ पूरी रात सोना चाहिए हमें
    मगर ये क्या सितम तिरे ख़याल बो रहे हैं हम

    शब-ए-विसाल पूरी रात जगना चाहिए हमें
    मगर ये क्या सितम सुकूँ की नींद सो रहे हैं हम
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    Deep kamal panecha
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    मैं ने माँगा फ़क़त अपने हक़ का ही है
    'दीप' तो तेरे दर पे सवाली नहीं
    Deep kamal panecha
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    कम हो गईं ख़्वाबों से बातें आज कल
    शायद मिरे अंदर का मैं ही मर गया
    Deep kamal panecha
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    मुस्कान ये उन की, ग़ज़ब हैरानी हैं
    बच्चों सी हरकत करती भी शैतानी हैं

    अब जो लिया हैं एक सफ़्हा हम ने फिर
    इक और "ग़ज़ल-ए-दीप" उस पर आनी हैं

    वो हँसते-हँसते ताली देते हैं हमें
    ये कैसी-कैसी करते वो नादानी हैं

    बेहद मुहब्बत हैं हमें उस शख़्स से
    बस बात ये ही हर ग़ज़ल में आनी हैं

    वो करती रहती तंज़ पैहम हम पे हैं
    वो भी हमारी लगता हैं दीवानी हैं

    मिलने न आए वो हमें इक बार फिर
    ये भी मुहब्बत दूर हम से जानी हैं
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Yusha Abbas 'Amr'Yusha Abbas 'Amr'Abhishek Bhadauria 'Abhi'Abhishek Bhadauria 'Abhi'Manohar ShimpiManohar ShimpiShan SharmaShan SharmaMohd AfsarMohd AfsarSarika saranshSarika saranshSandeep RajputSandeep RajputYashvardhan Mishra 'Hind'Yashvardhan Mishra 'Hind'Neeraj NainkwalNeeraj NainkwalSaniya TasnimSaniya Tasnim