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हमारे चाहने से कुछ नहीं होगानदी है वो कभी वापस नहीं मुड़ती
शफ़क़त भुलाया मुफ़्लिसी को देखकरपैसा नहीं है बोलता किसने कहा
ताज को कब तक निहारूँ बैठ तन्हायानी मुझ को भी बनाओ संगमरमर
पायाब जानकर कुछ हैं सोच में पड़े जोहर वक़्त थे पढ़े ये भूगोल की किताबें
लिफ़ाफ़े में मिला कुछ ख़ास है वर्नामिला उस डाकिया से तो लिफ़ाफ़ा है
हाल कोई तो मिरा भी पूछ ले एक मर्तबाझूठ कैसे बोलना है सीखना मैं चाहता
सारे अधूरे हैं तिरे इक हुस्न के वो सामनेतू जो दिखे तो रात में भी भोर हो जाए मिरा
चला आया मकाँ खाली करा कर मैंजले हैं आशियाने बेज़ुबाँ के भी
आजकल साफ़ है हाथ उस कामिल न पाया जिसे लूटने को
किया था भरोसा बहुत तुम सभी परभरोसा उठा है तुम्हीं से समझ लो