पागल-पन की हद कर दूँगी
तुम को ऐसे रद्द कर दूँगी
तुम को ऐसे रद्द कर दूँगी
अपना दिल जब भी मैं चाहूँ
बद-ख़्वाहों से बद कर दूँगी
आँख की बातें झुटलाऊँगी
कहना दिल का सनद कर दूँगी
आतिश-ए-इश्क़ में जल कर ख़ुद को
रौशन ता-ब-अबद कर दूँगी
दुनिया मुख़ालिफ़ होने से पहले
मैं दुनिया को रद्द कर दूँगी
पंजों के बल हो के 'दुआ' मैं
ऊँचा तेरा क़द कर दूँगी
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हाथों का लम्स मुझ को कभी भेज भी तो दे
ख़ुशबू सा है ख़याल तिरा ज़िंदगी तो दे
ख़ुशबू सा है ख़याल तिरा ज़िंदगी तो दे
अल्फ़ाज़ गुनगुनाऊँ तिरी चाहतों के मैं
दे इश्क़ का शुऊ'र मुझे शा'इरी तो दे
दर दिल के बज रहे हैं हवाओं के ज़ोर से
ऐ शाइ'र-ए-फ़िराक़ मुझे रौशनी तो दे
अब आ गया यक़ीन तिरी चाहतों पे है
बहकी हुई रुतों को ज़रा नग़मगी तो दे
महरम तू मेरा बन के ज़रा ओढ़ ले बदन
हर दर्द भूल जाए 'दुआ' हम-रही तो दे
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एक दिन देगी दग़ा ऐसा कभी सोचा न था
ज़िंदगी का रूप ये हम ने कभी देखा न था
ज़िंदगी का रूप ये हम ने कभी देखा न था
मैं पकड़ लाई थी जुगनू रौशनी के वास्ते
काली रातों का तसलसुल था तिरा चेहरा न था
बस अना थी दो दिलों के दरमियाँ झूटी अना
बीच में वर्ना हमारे फ़ासला इतना न था
आख़िरश मैं अपने अंदर की कमी में मर गई
तुम को मेरे ग़म की गहराई का अंदाज़ा न था
तू नज़र-अंदाज़ कर देगा मुझे ऐसे कभी
इस तरह का कोई मेरे दिल को तो धड़का न था
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दुखा है दिल तभी तो मुझ पे छाई है उदासी भी
मिरी पलकों पे आँसू भी लबों पर है ख़मोशी भी
मिरी पलकों पे आँसू भी लबों पर है ख़मोशी भी
जुदाई में मिरे दिल की सुनो क्या हो गई हालत
मिरे दिल में है वहशत भी बड़ी है बे-क़रारी भी
मिरी आँखों में वीरानी मिरे दिल को परेशानी
कुछ ऐसी चुप हुई हूँ मैं नहीं है ख़ुद-कलामी भी
हमें तो हिज्र में ही काटनी है ज़िंदगी अब तो
वो आ जाए नहीं उम्मीद बाक़ी अब ज़रा सी भी
अगरचे चोट गहरी है 'दुआ' फिर भी नहीं बदली
वही हँसने की आदत भी वही है ख़ुश-मिज़ाजी भी
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सुनता नहीं है दिल तो उस बे-वफ़ा की बातें
कल पर उठा के रक्खो उस बे-वफ़ा की बातें
कल पर उठा के रक्खो उस बे-वफ़ा की बातें
दिल है उदास अब तो इस तज़्किरे को बदलो
क्यूँ हो मुसिर कि सुन लो उस बे-वफ़ा की बातें
आज उस ने है रुलाया हम को बहुत सताया
हम से न करना अब तो उस बे-वफ़ा की बातें
टूटे हैं ख़्वाब मेरे अब दफ़्न इन को कर दो
दोहरा भी क्यूँ रहे हो उस बे-वफ़ा की बातें
हम को समेटना हैं अब दिल की किर्चियाँ भी
तोड़ा है दिल को देखो उस बे-वफ़ा की बातें
उस की जुदाई कैसे अब हम 'दुआ' सहेंगे
कुछ देर फिर से कर लो उस बे-वफ़ा की बातें
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दहलीज़ पर मिरी कोई आया है बरसों बा'द
हलचल सी दिल में कोई तो लाया है बरसों बा'द
हलचल सी दिल में कोई तो लाया है बरसों बा'द
अरमान दिल में मेरे नए जागने लगे
आँगन को चाँदनी ने सजाया है बरसों बा'द
आँखों में मेरी ख़्वाब हैं ताज़ा सजे हुए
ता'बीर-ए-ख़्वाब ले के वो आया है बरसों बा'द
पलकों पे मेरी जलने लगे दीप कुछ नए
मेरे लबों ने गीत ये गाया है बरसों बा'द
फिर शाख़-ए-दिल पे गुल नए उम्मीद के खिले
मौसम बहार-ए-ताज़ा का आया है बरसों बा'द
तन्हाई मेरी बाँट ली है उस ने प्यार से
नाम आज ले के उस ने बुलाया है बरसों बा'द
उस ने भी टूट कर हमें चाहा बहुत 'दुआ'
हम ने भी क़ुर्ब उस का यूँ पाया है बरसों बा'द
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मुझे हँसने की आदत थी मगर वो और कुछ समझा
ज़रा सी इक शरारत थी मगर वो और कुछ समझा
ज़रा सी इक शरारत थी मगर वो और कुछ समझा
मिरी हर बात पर हँसने से अक्सर वो उलझता था
मुझे उस से मोहब्बत थी मगर वो और कुछ समझा
मैं हँसती थी कि रंज-ओ-ग़म मिरा ज़ाहिर न हो उस पर
मुक़द्दर में जो ज़ुल्मत थी मगर वो और कुछ समझा
मैं सुन कर टाल जाती थी नसीहत की सभी बातें
मिरी दिल से बग़ावत थी मगर वो और कुछ समझा
सुनाना हाल-ए-दिल चाहा मगर उस को भी जल्दी थी
बड़ी अच्छी हिकायत थी मगर वो और कुछ समझा
मनाना चाहती थी सच्चे दिल से ऐ 'दुआ' उस को
उसे मुझ से शिकायत थी मगर वो और कुछ समझा
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