हर एक शख़्स के सीने में हम धड़कते हैं
सभी के होंटों पे है जा-ब-जा हमारा नाम
तमाम उम्र कई लफ़्ज़ चाक पर घू
में
तब एक अर्से में जा कर बना हमारा नाम
तुम्हारे कानों की ढलती हुई गुफाओं में
ब-रंग-ए-रौशनी पड़ता हुआ हमारा नाम
सदा कुछ और ही आई थी उस की जानिब से
हमें लगा था कि उस ने लिया हमारा नाम
ख़मोशियों के बदन पर सदाएँ लिखनी थीं
अजीब शख़्स था लिखने लगा हमारा नाम
फिर उस को सुन के बहुत देर तक सभी रोए
कोई कहानी थी आख़िर में था हमारा नाम
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हम अपने आप को इतना बदल नहीं सकते
तुम्हारे कहने से चेहरा बदल नहीं सकते
तुम्हारे कहने से चेहरा बदल नहीं सकते
बदलना चाहें अगर क्या बदल नहीं सकते
मगर जो हाल है दिल का बदल नहीं सकते
तुम्हारे वास्ते या'नी बदल चुके हैं बहुत
अब और ख़ुद को ज़ियादा बदल नहीं सकते
अजीब लोग हैं दुनिया बदलना चाहते हैं
मगर वो ख़ुद को ज़रा सा बदल नहीं सकते
डरे हुए हैं समुंदर मिरी रवानी से
मगर वो चाह के रस्ता बदल नहीं सकते
हमारी ज़ात को मुद्दत में ये हुआ है नसीब
अब अपने जीने का लहजा बदल नहीं सकते
अलावा दुख के तिरी क़िस्मतों में हम भी हैं
नसीब तेरा लिहाज़ा बदल नहीं सकते
वो एक दूजे से आँखें बदलते रहते हैं
जो लोग रोज़ का रोना बदल नहीं सकते
बदल रहा है रवय्या ज़रा ज़रा ही सही
अब एक दिन में तो सारा बदल नहीं सकते
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रख ली माथे पे शिकन उस की निशानी जैसे
नए घर में हो रखी चीज़ पुरानी जैसे
नए घर में हो रखी चीज़ पुरानी जैसे
ऐसे भूली है मिरी आँख हुनर रोने का
किसी झरने से बिछड़ जाए रवानी जैसे
तेरी आँखों से भला कैसे हटाऊँ आँखें
मुझ पे खुलते ही नहीं इन के मआ'नी जैसे
आइना कहने लगा कुछ कमी तुझ में भी है
हम ने भी पूछ धरा उस से कि या'नी जैसे
वो किसी शे'र में ढल जाए ग़नीमत वर्ना
उस को तफ़्सील से लिक्खूँगा कहानी जैसे
हम तिरे हिज्र में सहरा की तरफ़ क्यूँ भागें
हम ने सीखी ही नहीं ख़ाक उड़ानी जैसे
मैं ने हर रोज़ तुझे दिल से निकाला तो मगर
किसी दरिया से निकाले कोई पानी जैसे
क्या बुरा है कि जो बातिन है वही ज़ाहिर है
हम को आती ही नहीं बात बनानी जैसे
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सोच कर देखिए क्या ख़ूब नज़ारा होगा
उस ने जब रह के मेरा नाम पुकारा होगा
उस ने जब रह के मेरा नाम पुकारा होगा
हम ने सोचा था कि अब ग़म से किनारा होगा
पर कहाँ थी ये ख़बर इश्क़ दोबारा होगा
क्या कहें कब से ये उम्मीद लिए बैठे हैं
उस की जानिब से कभी कोई इशारा होगा
तुझ को देखूँ तो कोई और नज़र आता है
तू ने उस शख़्स को दिन रात गुज़ारा होगा
शहर में मुझ सा कोई और भी दीवाना है
हौसला हिज्र में वो शख़्स भी हारा होगा
किस तरह उस को बसाएँगे ज़रा से दिल में
सोचते रहते हैं जब कोई हमारा होगा
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तुझ को लगता है तो हाँ ठीक है मन-मानी है
मुझे अब बात समझनी है न समझानी है
मुझे अब बात समझनी है न समझानी है
वर्ना वो ख़्वाब कि ता-उम्र न सोए कोई
नींद आ जाती है इस बात की आसानी है
सत्ह में इस की सिवा रेत के अब कुछ भी नहीं
या'नी रोने के लिए आँख में बस पानी है
तजरबा उस को भी कुछ ख़ास नहीं दुनिया का
ख़ाक हम ने भी ज़माने की नहीं छानी है
मेरे चेहरे पे यही देख के बिखरी मुस्कान
मैं परेशान हूँ और उस को परेशानी है
इश्क़ में इतनी सुहूलत भी नहीं पाओगे
जान पर बन पड़ी तो जान चली जानी है
हम कहाँ रूह की बातों में उलझ जाते हैं
दरमियाँ अपने तअल्लुक़ भी तो जिस्मानी है
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अपनी तन्हाई ज़िंदगी कर ली
ज़ब्त छलका तो शा'इरी कर ली
ज़ब्त छलका तो शा'इरी कर ली
रंग में ढलते हुए तिरे मैं ने
शक्ल तक अपनी साँवली कर ली
रात भर आसमान में भटका
चाँद ने सुब्ह ख़ुद-कुशी कर ली
जब ज़बाँ वाले बे-वफ़ा निकले
बे-ज़बानों से दोस्ती कर ली
तू मिरे हासिलों में है तो नहीं
फिर भी ख़्वाहिश कभी कभी कर ली
फिर किया इश्क़ और फिर पूरी
जो कसर थी रही-सही कर ली
कुछ ने चुन ली ग़ज़ल की मुश्किल राह
कुछ ने घबरा के नौकरी कर ली
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मिरा यक़ीन है वो आइना निकालेगी
वो नक़्स मुझ में ही फिर कुछ नया निकालेगी
वो नक़्स मुझ में ही फिर कुछ नया निकालेगी
मुझे भी कुछ नहीं कहना कि अब ख़मोशी ही
हमारे बीच कोई रास्ता निकालेगी
जबीं पे उस की शिकन है न आँख में पानी
भला वो दिल से हमें और क्या निकालेगी
मिरी ख़मोशी का मतलब था सिर्फ़ ख़ामोशी
वो इस में पहलू मगर दूसरा निकालेगी
ऐ दुनिया बोल मगर कुछ नहीं सुनूँगा मैं
ज़बाँ से जो भी तू अच्छा बुरा निकालेगी
हमें न सुध है न हम दस्तकें ही सुनते हैं
तू अपने दिल से हमें क्या भला निकालेगी
मैं दूरियों में भी नज़दीकियाँ निकालता हूँ
वो फ़ासलों में भी कुछ फ़ासला निकालेगी
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देखते देखते ही साल गुज़र जाता है
पर तिरा ग़म है कि बढ़ता है ठहर जाता है
पर तिरा ग़म है कि बढ़ता है ठहर जाता है
तैरती रहती है आँखों में तू हर शब ऐसे
जैसे दरिया में कोई चाँद उतर जाता है
कौन उस ख़्वाब की ता'बीर पे करता है यक़ीं
ख़्वाब जो नींद से लड़ता हुआ मर जाता है
हम ने आँखों की ज़बानों पे लगाए हैं क़ुफ़्ल
वर्ना दिल तेरी ही आवाज़ों से भर जाता है
कोई हर रोज़ मुझे छोड़ के मर जाता है
जाने वो कौन है कैसा है किधर जाता है
एक ही वक़्त में सुख-दुख नहीं मिलते मुझ को
पाँव गर अपने बचाऊँ तो सफ़र जाता है
फिर से दुनिया की तरफ़ ध्यान लगाया है मगर
ख़ाक इतने में तिरा दिल से असर जाता है
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