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दिल बहलने के वसीले दे गया वो
अपनी यादों के खिलौने दे गया वो
अपनी यादों के खिलौने दे गया वो
हम-सुख़न तन्हाइयों में कोई तो हो
सूने सूने से दरीचे दे गया वो
ले गया मेरी ख़ुदी मेरी अना भी
ऐ जबीन-ए-शौक़ सज्दे दे गया वो
रंज-ओ-ग़म सहने की आदत हो गई है
ज़िंदा रहने के सलीक़े दे गया वो
मेरी हिम्मत जानता था इस लिए भी
डूबने वाले सफ़ीने दे गया वो
ज़िंदगी भर जोड़ते रहना है इन को
टूटी ज़ंजीरों से रिश्ते दे गया वो
ज़र-फ़िशाँ हर लफ़्ज़ ज़र्रीं हर वरक़ है
'अख़्तर' ऐसे कुछ सहीफ़े दे गया वो
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लम्हा लम्हा यही सोचूँ यही देखा चाहूँ
तेरी आँखों में तो बस अपना ही चेहरा चाहूँ
तेरी आँखों में तो बस अपना ही चेहरा चाहूँ
ये भी क्या बात कि मैं तेरी अना की ख़ातिर
तेरी क़ामत से ज़ियादा तिरा साया चाहूँ
मुझ से उल्फ़त भी नहीं है तो न जाने फिर क्यूँ
तेरी महफ़िल में फ़क़त अपना ही चर्चा चाहूँ
वो तो गूँगा है मगर मुझ को ये ज़िद है कैसी
अपनी ता'रीफ़ में कुछ उस से भी सुनना चाहूँ
साथ देने से हुए जाते हैं क़ासिर अल्फ़ाज़
जाने क्या क्या मैं तिरी शान में लिखना चाहूँ
मैं तो इक ऐसा मुसाफ़िर हूँ जो थकता ही नहीं
अपनी मंज़िल से भी आगे कोई जादा चाहूँ
दिल से बादल कभी उठते ही नहीं हैं 'अख़्तर'
किस लिए आँखों से बहता हुआ दरिया चाहूँ
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जब मुख़ालिफ़ मिरा राज़-दाँ हो गया
राज़-ए-सर-बस्ता सब पर अयाँ हो गया
राज़-ए-सर-बस्ता सब पर अयाँ हो गया
मुझ को एहसास-ए-शर्मिंदगी है बहुत
क़िस्सा-ए-दर्द कैसे बयाँ हो गया
कितनी हसरत से तकती रही हर ख़ुशी
और दामन मिरा धज्जियाँ हो गया
मसअला बन गई फ़िक्र तफ़्हीम का
लफ़्ज़ का हुस्न भी राएगाँ हो गया
लोग ये सोच के ही परेशान हैं
मैं ज़मीं था तो क्यूँ आसमाँ हो गया
शिकवा-संजान-ए-तन्हाई हैं सब के सब
मेरा ग़म भी ग़म-ए-दो-जहाँ हो गया
पेड़ क्या मेरे आँगन का 'अख़्तर' गिरा
लोग समझे कि मैं बे-अमाँ हो गया
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