कहाँ से लाएँगे आँसू अज़ा-दारी के मौसम में

बहुत कुछ रो चुके हम तो अदाकारी के मौसम में

उतर आऊँगा मैं भी ज़ीना-ए-हस्ती से यूँ इक दिन
कि जैसे रंग-ए-रुख़ उतरे है नादारी के मौसम में

तुम्हारे ख़त कभी पढ़ना कभी तरतीब से रखना
अजब मशग़ूलियत रहती है बेकारी के मौसम में

ब-जुज़ मेरे ज़माने की क़बा रंगीन कर डाली
ये क्या तफ़रीक़ रक्खी उस ने गुल-कारी के मौसम में

सर-ए-बर्ग-ए-तमन्ना मरहम-ए-दीदार कह जाएँ
न आएँ सामने मेरे निगह-दारी के मौसम में

तुलू-ए-मेहरस टूटेगी उन की नींद ना-मुम्किन
जो ख़्वाबीदा रहा करते हैं बेदारी के मौसम में

तरस खाते हैं क्यूँ अहबाब मेरे हाल पर 'अख़्तर'
बहुत बे-चैनियाँ बढ़ती हैं ग़म-ख़्वारी के मौसम में

— Akhtar Shahjahanpuri

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