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सुन! हिज्र और विसाल का जादू कहाँ गया
मैं तो कहीं नहीं था मगर तू कहाँ गया
मैं तो कहीं नहीं था मगर तू कहाँ गया
जब ख़ेमा-ए-ख़याल में तस्वीर है वही
वो दश्त-ए-ना-मुराद वो आहू कहाँ गया
बिस्तर पे गिर रही है सियह आसमाँ से राख
वो चाँदनी कहाँ है वो मह-रू कहाँ गया
जिस के बग़ैर जी नहीं सकते थे जा चुका
पर दिल से दर्द आँख से आँसू कहाँ गया
फिर ख़ाक उड़ रही है मकान-ए-वजूद में
ऐ जान-ए-बे-क़रार वो दिल-जू कहाँ गया
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ये गुल जिस ख़ाक से लाया गया है
उसे अफ़्लाक से लाया गया है
उसे अफ़्लाक से लाया गया है
चमन पे रंग आता ही नहीं था
तिरी पोशाक से लाया गया है
ये दिल जिस से मैं शर्मिंदा बहुत हूँ
उसी बेबाक से लाया गया है
उजाला है जो ये कौन-ओ-मकाँ में
हमारी ख़ाक से लाया गया है
ये जो कुछ भी है आया है कहाँ से
दिल-ए-सद-चाक से लाया गया है
यहाँ कितनों ने देखा है जो तूफ़ाँ
ख़स-ओ-ख़ाशाक से लाया गया है
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ऐसा एक मक़ाम हो जिस में दिल जैसी वीरानी हो
यादों जैसी तेज़ हवा हो दर्द से गहरा पानी हो
यादों जैसी तेज़ हवा हो दर्द से गहरा पानी हो
एक सितारा रौशन हो जो कभी न बुझने वाला हो
रस्ता जाना-पहचाना हो रात बहुत अन-जानी हो
वो इक पल जो बीत गया उस में ही रहें तो अच्छा है
क्या मालूम जो पल आए वो फ़ानी हो ला-फ़ानी हो
मंज़र देखने वाला हो पर कोई न देखने वाला हो
कोई न देखने वाला हो और दूर तलक हैरानी हो
एक अजीब समाँ हो जैसे शे'र 'मुनीर'-नियाज़ी का
एक तरफ़ आबादी हो और एक तरफ़ वीरानी हो
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नींद में गुनगुना रहा हूँ मैं
ख़्वाब की धुन बना रहा हूँ मैं
ख़्वाब की धुन बना रहा हूँ मैं
एक मुद्दत से बाग़ दुनिया का
अपने दिल में लगा रहा हूँ मैं
क्या बताऊँ तुम्हें वो शहर था क्या
जिस की आब ओ हवा रहा हूँ मैं
अब तुझे मेरा नाम याद नहीं
जब कि तेरा पता रहा हूँ मैं
आज कल तो किसी सदा की तरह
अपने अंदर से आ रहा हूँ मैं
ऐसा मुर्दा था मैं कि जीने के
ख़ौफ़ में मुब्तला रहा हूँ मैं
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ये जो इक शाख़ है हरी थी अभी
उस जगह पर कोई परी थी अभी
उस जगह पर कोई परी थी अभी
सर-बसर रंग-ओ-नूर से लबरेज़
इक सुराही यहाँ धरी थी अभी
ख़ाक कैसी है मेरे पाँव तले
सात रंगों की इक दरी थी अभी
इस ख़राबे में कोई और भी है
आह किस ने यहाँ भरी थी अभी
सानेहा कोई याँ से गुज़रा है
ये फ़ज़ा क्यूँ डरी डरी थी अभी
मैं बसाता था उस के दिल में घर
और क़िस्मत में बे-घरी थी अभी
क्यूँ न करते हम उस की दिलदारी
उस में कुछ ख़ू-ए-दिलबरी थी अभी
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