पस-ए-फ़सील ज़मानों का इंतिज़ार न हो
ये शहर और किसी शहर का ग़ुबार न हो
ये ख़्वाब भी न किसी ख़्वाब का इशारा हो
ये नींद और किसी नींद का ख़ुमार न हो
ये दश्त और किसी दश्त का सराब सही
ये बाग़ और किसी बाग़ की बहार न हो
बहुत दिनों से यही सोच कर परेशाँ हूँ
कि तू भी मेरे गुमाँ ही का ए'तिबार न हो
कोई तो वस्ल की साअ'त हो जो ठहर जाए
कोई तो साँस लूँ ऐसी कि जो शुमार न हो
— Akbar Masoom















