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हमारी आँखें भी साहिब अजीब कितनी हैं
कि दिल जो रोए तो कम-बख़्त हँसने लगती हैं
कि दिल जो रोए तो कम-बख़्त हँसने लगती हैं
तुम्हारे शहर से चलिए कि तंग-दस्ती ने
तुम्हारे शहर की गलियाँ भी तंग कर दी हैं
ये हम हैं बे-हुनराँ देखिए हुनर-मंदी
जो कोई काम करें हम तो पोरें जलती हैं
न इस का वस्ल मिला और न रोज़गार यहाँ
सो पहले हिज्र-ज़दा थे और अब के हिज्रती हैं
तो शाह-ज़ादी को लाएँ वो महव-ए-ख़्वाब है क्या
हमें यक़ीं नहीं परियाँ भी झूट बोलती हैं
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हमारा इश्क़ सलामत है या'नी हम अभी हैं
वही शदीद अज़िय्यत है या'नी हम अभी हैं
वही शदीद अज़िय्यत है या'नी हम अभी हैं
उसी पुरानी कहानी में साँस लेते हैं
वही पुरानी मोहब्बत है या'नी हम अभी हैं
न जाने कब से दर-ए-दास्ताँ पे बैठे हैं
और इंतिज़ार की हिम्मत है या'नी हम अभी हैं
तलब के कर्ब में इक मर्ग के दुआ-गो थे
तलब में वैसी ही शिद्दत है या'नी हम अभी हैं
कसी के नाम पे हम दोस्ती निभाते थे
और अब भी वैसी ही शोहरत है या'नी हम अभी हैं
तलब बढ़ाती चली जा रही है अपनी हवस
सो क़द्रे ख़ाम क़नाअ'त है या'नी हम अभी हैं
कलाम-ए-'मीर' के सदक़े में शे'र होते हैं
जो बैत है सो क़यामत है या'नी हम अभी हैं
अजब ये शे'र हैं अपने कि जिन में हम भी नहीं
बस एक ग़म की शरारत है या'नी हम अभी हैं
ये इश्क़ पेशगी दार-ओ-रसन के हंगा
में
ये रंग ज़िंदा सलामत है या'नी हम अभी हैं
अमीर-ए-शहर है बेचैन शैख़ ख़ौफ़-ज़दा
अभी तलक ये अदावत है या'नी हम अभी हैं
न पूरी है न अधूरी ये दास्तान-ए-अलम
कोई सुनी सी हिकायत है या'नी हम अभी हैं
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हमें न देखिए हम ग़म के मारे जैसे हैं
कि हम तो वैसे हैं उस के इशारे जैसे हैं
कि हम तो वैसे हैं उस के इशारे जैसे हैं
ये वस्ल, वस्ल की मद में ग़लत शुमार किया
कि उस के साथ भी यूँही किनारे जैसे हैं
तिलिस्म-ए-चश्म सलामत रहे कि जिस के सबब
कहीं हैं फूल कहीं हम सितारे जैसे हैं
वो जानता है जभी दूर भागता है बहुत
वो जानता है हम उस को ख़सारे जैसे हैं
हम आज हँसते हुए कुछ अलग दिखाई दिए
ब-वक़्त-ए-गिर्या हम ऐसे थे, सारे जैसे हैं
उसे कहो कि सितारे शुमार तो न करे
कहो क़दम धरे, छोड़े उतारे जैसे हैं
ये ग़म के फूल हैं या शे'र देखिए और बस
हमें पता है कि हम ने निखारे जैसे हैं
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ऐ मियाँ कौन ये कहता है मोहब्बत की है
बात ये है कि यहाँ बात ज़रूरत की है
बात ये है कि यहाँ बात ज़रूरत की है
फिर कोई चाक गरेबान लिए फिरता है
हज़रत-ए-इश्क़ ने फिर कोई शरारत की है
बस यूँही एक हयूला सा नज़र आया था
और फिर दिल ने धड़कने की जो शिद्दत की है
वो मिरी चाह का वैसे भी तलबगार न था
फिर मिरे दिल ने सँभलने में भी उजलत की है
हम बहुत दूर चले आए हैं बसने को 'अता'
इस से पहले भी बहुत दूर से हिजरत की है
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मिरे लिए तिरा होना अहम ज़ियादा है
ये बाक़ी ज़िक्र-ए-वजूद-ओ-अदम ज़ियादा है
ये बाक़ी ज़िक्र-ए-वजूद-ओ-अदम ज़ियादा है
वो ख़ाली-पन है कहीं कुछ कशिश नहीं है मुझे
कोई ख़ुशी है बहुत और न ग़म ज़ियादा है
तिरे बग़ैर ज़रूरत ही किया पड़ी है मुझे
तिरे बग़ैर ये दम है सो दम ज़ियादा है
ये मेरी आँख है याँ ख़्वाब कैसे ठहरेंगे
कि सीम-ख़ुर्दा ज़मीं है जो नम ज़ियादा है
मिरा ये दिल कि जिसे कोई पेच-ओ-ताब नहीं
तिरी ये ज़ुल्फ़ जिसे पेच-ओ-ख़म ज़ियादा है
तू ख़ूब जानता है यार-ए-बे-नियाज़ कि अब
जुनूँ बहुत है मुझे फिर भी कम ज़ियादा है
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सफ़्हा-ए-ज़ीस्त जब पढूँगा तुम्हें
देर तक चूमता रहूँगा तुम्हें
देर तक चूमता रहूँगा तुम्हें
तुम भले देखते रहो सब को
मैं छुपा कर कहीं रखूँगा तुम्हें
तुम बने हो बने रहो ख़ुशबू
मैं किसी रोज़ ले उड़ूँगा तुम्हें
राग हो, दिल की धड़कनों का राग
सामने बैठ कर सुनूँगा तुम्हें
देखना देखते हुए मुझ को
किस तरह आँख में भरूँगा तुम्हें
जाओ छुपते फिरो गुरेज़ करो
एक दिन मैं भी देख लूँगा तुम्हें
तुम बहुत दूर जा चुके होगे
मैं कहाँ ढूँढ़ता फिरूंगा तुम्हें
इक दिन अहमद-'अता' भी ख़्वाब हुआ
कह गया ख़्वाब में मिलूँगा तुम्हें
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