तेरे हिस्से जो आए वो मेरी ख़ुशियों के प्याले हों
तेरे सब ज़ख़्म ग़म हरदम यहाँ मेरे हवाले हों
तेरे सब ज़ख़्म ग़म हरदम यहाँ मेरे हवाले हों
लिखा कुछ है नहीं अरसे से मैं ने अब ये लगता है
विचारों पे मेरे शाइ'र ने पन्ने भर न डाले हों
उलझती ज़िंदगी में बस मुझे इतनी रिफ़ाक़त हो
मेरे अश्कों से पढ़ ले वो जो भी आँखों में नाले हों
सभी ने हाल पूछा है मरीजों का यहाँ लेकिन
उसे पूछा नहीं है जिस ने उस के ग़म सँभाले हों
मेरी आँखें तेरे ख़्वाबों को बस इतनी सलामत दें
तेरी हस्ती को इन आँखों से हरदम बस उजाले हों
कभी लगते नहीं हैं बस्ते भारी उन को कंधों पर
लड़कपन उम्र में जिस ने ये सारे पेट पाले हों
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हमारे दर्मियां कुछ था नहीं जग में नुमाइश थी
तेरे जाने पे फिर क्यूँ दिल मेरा नासूर होता है
तेरे जाने पे फिर क्यूँ दिल मेरा नासूर होता है
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मैं बे-मतलब सा इश्क़ निभाना चाहती हूँ
उस की बातों से नज़्म चुराना चाहती हूँ
उस की बातों से नज़्म चुराना चाहती हूँ
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मेरे ज़ख़्मों की सरगम को हवाओं ने समेटा है
कोई छू कर गुज़रता है उसे बरखा समझता है
कोई छू कर गुज़रता है उसे बरखा समझता है
मैं तुम को कह तो देती ग़म मेरा, मेरी ये बेचैनी
मगर तुम में, यहाँ सब में मुझे अब फ़र्क लगता है
जो तन्हा है वो तन्हाई के क़िस्सों को नहीं गाता
जो महशर में दबा जज़्बों को बैठा है वो तन्हा है
~साक्षी सारस्वत
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