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गुनाहों का नहीं है इल्म उस को क़ैदख़ाने में
यक़ीनन छूट जाएगा तो फिर ये दिल लगाएगा
यक़ीनन छूट जाएगा तो फिर ये दिल लगाएगा
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तन्हा जीते जी मर जाना पड़ता है
ऐसे ही क्या प्यार निभाना पड़ता है
ऐसे ही क्या प्यार निभाना पड़ता है
जिस के बिना नहीं ये दिल मेरा लगता
उस के घर तो आना जाना पड़ता है
मय-ख़ाने से पी कर हम घर को निकले
रस्ते में भी इक मयखाना पड़ता है
कह देना कि इश्क़ है आसाँ काम नहीं
कहने में थोड़ा हकलाना पड़ता है
जब आँखों से राज कोई पढ़ लेता है
अपने ही सच को झुठलाना पड़ता है
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