हम ऐसे लोग भी जाने कहाँ से आते हैं
ख़ुशी में रोते हैं जो ग़म में मुस्कुराते हैं
हमारा साथ भला कब तलक निभाते आप
कभी कभी तो हमीं ख़ुद से ऊब जाते हैं
बहारें अब नहीं आती फ़िज़ाओं में
ख़िज़ाँ फैली है यूँ चारो दिशाओं में
ये रानाई नहीं भाती मेरे दिल को
पड़ा रहता हूँ मैं अक्सर ख़लाओं में
करूँ क्या जी नहीं लगता कहीं पर भी
असर ऐसा है उसकी बद्दुआओं में
ख़ुशी का वास्ता भी ज़िंदगी से क्या
हँसी आती नहीं अब कल्पनाओं में
हँसा है आज भी ये रास्ता मुझ पर
वही हैं तल्ख़ियाँ अब भी हवाओं में
किसी की आँख में जो नूर था 'मोहित'
नहीं है अब वो सूरज की शुआओं में
हमने इक ज़ख़्म को बचपन से हरा रक्खा है
उसकी तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है
इसलिए भी न कही बात कभी दिल की उसे
दिल वो देखेगा नहीं बात में क्या रक्खा है
नींद में भूल गया उसने बुझाया न दिया
हम नहीं सोए कि खिड़की पे दिया रक्खा है
आस में कितने परिंदे हैं उसे इल्म नहीं
आज भी पेड़ के नीचे वो घड़ा रक्खा है
एक लड़की है फ़क़त एक ही लड़की मेरे दोस्त
शहर के शहर को दीवाना बना रक्खा है
वो ही देता है मेरे ग़म के शजर को पानी
मैंने जिस शख़्स को आँखों में बसा रक्खा है
हमको मालूम है 'मोहित' वो नहीं आएगा
हमने जिसके लिए दरवाज़ा खुला रक्खा है